वन विभाग द्वारा निमंत्रित अतिथि प्रशिक्षक पद्मश्री भूरीबाई ने कहा:बचपन से था चित्रकारी करने का शौक, इससे मिला देश में सम्मान और पहचान

सेंधवाएक महीने पहले
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प्रतिभागियों ने भूरीबाई को अपनी कलाकृति दिखाई। - Dainik Bhaskar
प्रतिभागियों ने भूरीबाई को अपनी कलाकृति दिखाई।

मुझे बचपन से चित्रकारी का शौक था। घर की दीवारों पर पारंपरिक पिथोरा कला के चित्र बनाती थी। इस शौक की वजह से आगे चलकर सम्मान और पहचान मिलेगी कभी सोचा नहीं था। सरकार को प्रदेशभर में इस तरह के प्रशिक्षण आयोजित करना चाहिए जिससे युवा सीखकर आगे बढ़ें। यह बात वन विभाग सेंधवा द्वारा आयोजित पारंपरिक चित्रकला प्रशिक्षण में प्रशिक्षण देने आई पद्मश्री भूरीबाई ने भास्कर से चर्चा में कही। प्रदेश के झाबुआ जिले के पिटोल निवासी भील कलाकार भूरीबाई को कला के क्षेत्र में उत्कृष्ठ कार्य करने के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया है।

वे आदिवासी समुदाय से आती हैं और पहली भील महिला हैं जिन्होंने कागज और कैनवास पर अपने अनुभवों और जातीय स्मृतियों को दर्ज किया है। भूरीबाई ने बताया कि शादी के बाद मैं पति के साथ मजदूरी करने भोपाल गई। वहां भारत भवन के तत्कालीन डायरेक्टर और प्रसिद्ध कलाकार जे. स्वामीनाथन ने उनसे ग्रामीण संस्कृति, कला और परंपरा के बारे में जानकारी ली। उनके ही कहने पर कागज पर भील शैली के चित्रों को उकेरना शुरू किया। उनके आशीर्वाद से बहुत सीखा और आगे बढ़ी। बाद में संस्कृति विभाग की तरफ से उन्हें पेटिंग बनाने का काम दिया गया। जिसके बाद वे भोपाल के भारत भवन में पेटिंग करने लगी।

मध्यप्रदेश सरकार ने अहिल्या सम्मान से भी किया सम्मानित

1986-87 में मध्‍यप्रदेश सरकार के सर्वोच्‍च पुरस्‍कार शिखर सम्‍मान से सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा 1998 में मध्‍यप्रदेश सरकार ने ही उन्‍हें अहिल्या सम्‍मान से भी सम्मानित किया। 2021 में पद्मश्री भी मिला। भोपाल और जे. स्वामीनाथन ने मेरी पहचान ही बदल दी। इसके बाद बेटा, बेटी, बहू सहित अन्य लोगों को सिखाया। सबको कला बांट रही हूं। जनजातीय संग्रहालय से जुड़ी हूं। वहां देश-विदेश से आए लोग पेंटिंग को खरीदते हैं।

स्वरोजगार और संस्कृति पुनर्जीवन था उद्देश्य
डीएफओ अनुपम शर्मा ने बताया कि ग्रीन इंडिया मिशन के अंतर्गत आयोजन किया गया। यह दूसरा सत्र था। इसका उद्देश्य जनजातीय क्षेत्रों में निवासरत ग्रामीणों को स्वरोजगार और जनजातीय संस्कृति का पुनर्जीवन है। पद्मश्री भूरी बाई बारिया के बेटे अनिल बारिया व बेटी शांता बारिया ने 19 से 2 अक्टूबर तक प्रशिक्षण दिया। इसमें 30 से अधिक प्रतिभागी शामिल हुए। समापन पर शुक्रवार शाम समस्त प्रतिभागियों की कलाकृतियों को सराहा गया एवं प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किए गए। प्रतिभागी कलाकार अभय जांगिड़ ने भूरीबाई को पेंसिल से बनाया उनका स्केच भेंट किया।

डीएफओ ने बताया प्रतिभागियों की प्रतिभा के प्रदर्शन एवं प्रचार प्रसार के लिए श्रेष्ठ कलाकृतियां विभिन्न जन प्रतिनिधियों एवं उच्च अधिकारियों को भेंट की जाएगी। प्रतिभागियों द्वारा भविष्य में निर्मित कलाकृतियों की मध्यप्रदेश के राष्ट्रीय उद्यानों एवं चिड़ियाघरों के माध्यम से उचित कीमत पर बिक्री के प्रयास किए जाएंगे। प्रतिभागियों की कला का वन मेले जैसे अनेक मंचों पर प्रदर्शन भी किया जाएगा। प्रतिभागियों की सुविधा के लिए सेंधवा वन विभाग द्वारा ही आवागमन एवं भोजन की उचित व्यवस्था की गई थी।

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