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MP से फिसला गंगा की सफाई का पुण्य:चंबल में बना डेढ़ करोड़ का प्रोजेक्ट, 3 विलुप्त प्रजाति के मांसभक्षी कछुओं को गंगा नदी में छोड़ा जाना था, फंड की कमी से योजना बंद

भिंड/ पवन दीक्षित8 महीने पहले
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चंबल नदी के पास कछुआ सरंक्षण योजना का लगा बोर्ड। - Dainik Bhaskar
चंबल नदी के पास कछुआ सरंक्षण योजना का लगा बोर्ड।
  • 2016-17 में चंबल नदी के किनारे बरही गांव में बनना था प्राेजेक्ट
  • 70 लाख रुपए स्वीकृत होकर आए, इसके बाद नहीं मिले पैसे

गंगा नदी की सफाई का पुण्य मध्यप्रदेश के हिस्से में आते-आते रह गया। शासन की उदासीनता और फंड के अभाव प्रोजेक्ट ही बंद कर दिया गया। असल में, भिंड में चंबल नदी किनारे वन विभाग ने पांच साल पहले विलुप्त प्रजाति के मांसभक्षी कछुओं के संरक्षण का प्रोजेक्ट तैयार किया था। इन कछुओं की पैदावार बढ़ाकर गंगा नदी में भेजा जाना था। ये कछुए गंगा की सफाई में अहम भूमिका निभाते, लेकिन यह प्रोजेक्ट शुरू होने के साथ ही बंद हो गया। पिछले साल यहां कछुए के बच्चे मरना शुरू हो गए। इसके बाद अफसरों ने हाथ खड़े कर दिए। बाद में पूरा प्रोजेक्ट ही फेल हो गया।

चंबल नदी के किनारे बसे बरही गांव में वर्ष 2016-17 में चंबल नदी में विलुप्त होती कछुए की मांसभक्षी प्रजाति के संरक्षण को लेकर योजना तैयार की गई थी। इस पर करीब डेढ़ करोड़ खर्च होना था। वन विभाग के अफसरों के मुताबिक करीब 70 लाख स्वीकृत होकर आए। इसके बाद यह राशि को कछुए के अंडे रखने, प्रजनन हैचरी बनाए जाने, ऑफिस बिल्डिंग व आवास आदि पर खर्च किया गया। इसके बाद राशि शासन की ओर से नहींं भेजी गई।

कछुओं के पालन के लिए तैयार की गई हैचरी।
कछुओं के पालन के लिए तैयार की गई हैचरी।

कछुओं के बच्चों की मौतों पर नहीं हुई जांच

यहां चार अलग-अलग हैचरी तैयार की गई थी। इन हैचरी में चंबल की रेत और पानी के टैंक बनाकर नदी जैसा नेचर दिया गया था। इसके बाद यहां करीब 600 संख्या में कछुए के अंडे (विलुप्त मांसभक्षी प्रजाति के) लाकर रखे गए। इसके बाद वर्ष 2019 - 20 में बढ़ी तादाद में कछुओं के बच्चों की मौत होने लगी। सूत्र बताते हैं, कछुओं के बच्चों की मौत का एक कारण है कि नदी में पाए जाने वाले मृत जीवों जैसा भोजन व्यवस्था नहीं की जा सकी। इधर, शासन की ओर से राशि रोके जाने के बाद यह प्रोजेक्ट खटाई में चला गया। वन अफसर बचे हुए करीब 271 कछुए और उनके अंडों को लेकर मुरैना के देवरी सेंचुरी चले गए। उन्होंने चंबल नदी में इन्हें विचरण के लिए छोड़ दिया था।

इन तीन प्रजातियों के कछुओं का होना था संरक्षण

चंबल नदी में बाटागुर कछुआ, बाटागुर डोंगोका, कछुआ टेंटोरिया, हारडेला थुरगी, चिप्रा इंडिका, निलसोनिया, निलसोनिया ह्यूरम, लेसिमस पंटाटा, लेसिमस ऐंडरसनी की प्रजातियां पाई जाती हैं। यहां अतिविलुप्त प्रजाति के कछुए साल अथवा बाटागुर कछुआ, टेंटोरियम और निलसोनिया संरक्षण किया जाना था।

जलवायु परिवर्तन के कारण जलीय जीव पर संकट

जलीय जीव पर आने वाले संकट आने का कारण जलवायु में परिवर्तन है। इस कारण से दुर्लभ कछुओं की संख्या घट रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि चंबल में जलस्तर कम होना। समय पर बारिश न होने और अधिक तापमान की वजह से जलीय जीवों पर बुरा असर पड़ रहा है। अगर ये प्रोजेक्ट सफल हो जाता तो मांसभक्षी कछुओं की इन तीन विलुप्त प्रजातियां के संरक्षण से सीधे तौर पर गंगा नदी की सफाई में सहयोग मिलता। इसके अलावा कछुए की नई प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाया जा सकता था। ऐसे में प्रदेश का पहला कछ़ुआ संरक्षण सेंटर भिंड में मना जाता। ऐसा होने से जलीय जीव प्रेमी व पर्यटकों की संख्या में इजाफा होता।

योजना का सिर्फ बोर्ड ही बाकी रह गया।
योजना का सिर्फ बोर्ड ही बाकी रह गया।

बजट नहीं आया, इसलिए काम रुक गया

कछुआ संरक्षण केंद्र के प्रभारी नरेंद्र सिंह कुशवाह का कहना है कि शुरुआत में पैसा आया। काम भी हुआ फिर पैसा आना बंद हो गया। इधर, कछुओं के बच्चे मरने लगे। इसके बाद अफसर बचे हुए अंडे और कछुए के बच्चे लेकर मुरैना चले गए।

वहीं, चंबल सेंचुरी के रेंजर दीपक शर्मा का कहना है कि यह प्रोजेक्ट मेरे पदस्थ होने से पहले तैयार हुआ था। मुझे इसी स्थिति में मिला। पैसे की कमी के कारण प्रोजेक्ट बंद होने की बात बताई जाती है।

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