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फाइटर्स को सैल्यूट:डेढ़ महीने तक अपनों से बनाई दूरी, अब हालात सामान्य होते ही परिवार को समय दे रहे डॉक्टर

अशोकनगर8 दिन पहले
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  • पत्नी, बेटा पॉजिटिव होने पर भी फोन पर किया इलाज ताकि अस्पताल में न हो दिक्कत

कोरोना की दूसरी लहर का कहर करीब 1 माह तक रहा। कोरोना पीक में जिला अस्पताल में कोई भी बेड खाली नहीं था, लोगों को जमीन पर लेटकर अपना इलाज कराना पड़ा था। ऐसे में कोरोना योद्धा डॉक्टर, मेडिकल स्टाफ ने अपने परिवार से दूर रहकर अपनी सेवाएं दीं। उनकी मेहनत का असर है कि आज हालात बदल गए हैं। एक महीने तक इन फाइटर्स ने अपने परिवार से तक दूरियां बना ली थीं।

अस्पताल ही उनका घर हो गया था। कई डॉक्टर खुद पॉजिटिव हो गए थे जो ठीक थे उन्होंने अस्पताल में भर्ती मरीजों के हालात सुधारने के लिए अपने परिवार से न सिर्फ दूरी बनाई बल्कि उनके संक्रमित होने पर उनका इलाज फोन पर ही किया। अब हालात में सुधार हुआ है आैर अपने परिवार के साथ डॉक्टर्स समय बिता पा रहे हैं।
फाइटर्स ने किया अपना काम अब हमारी बारी
कोरोना के हराने में डॉक्टर्स ने अपना काम कर लिया लेकिन अब भी खतरा टला नहीं है। अब हम लोगों की बारी है, अगर हम इसी तरह बाजार में बिना मास्क और लापरवाही के रहते हैं तो डॉक्टर्स की मेहनत बेकार हो जाएगी। अपने बचाव के लिए खुद सावधानी रखें।
पीक टाइम होने पर बच्चे से बनाई दूरी
डॉ. अंकुर तारई:
मैंने पहली बार इतना वर्क लोड देखा था। 24 घंटे में सिर्फ सोने के लिए घर जा पाते थे। ड्यूटी के अलावा ऑन काॅल के लिए अस्पताल में ही रहते थे। क्योंकि दूसरी लहर में हमारे डॉक्टर भी पॉजिटिव हो गए। स्टाफ कम था एक दूसरे की मदद करना जरूरी था। कोरोना काल में ये हाल थे कि मैं अपने 15 महीने के बच्चे को भी एक महीने तक हाथ में नहीं ले पाया। आज अस्पताल से जब भी घर जाता हूं सबसे पहले उसके साथ ही खेलता हूं।
पत्नी, बेटा का फोन पर ही किया इलाज
डॉ. अजय गहलोत: दूसरी लहर उम्मीद से ज्यादा खतरनाक रही। जिस हिसाब के इंतजाम किए थे उससे 5 गुना बढ़कर मरीज आए थे। इसी टाइम मेरी सास कोरोना पॉजिटिव हो गई थी जिससे उनकी मौत हो गई। मेरी पत्नी और 6 साल का बेटा भी संक्रमित हो गए। इन परिस्थितियों में भी मैंने हिम्मत नहीं हारी और लगातार सेवाएं देता रहा। उनका मैंने फोन पर ही इलाज किया। अब सब ठीक हैं और नॉर्मल दिनों की तरह मैं परिवार के साथ समय बिता पा रहा हूं।

खुशी इस बात की अब परिवार को दे पा रहा हूं समय
डॉ. मनीष चौरसिया :
पहली बार की लहर में ज्यादा दिक्कत नहीं थी। अधिकांश दूसरी लहर में समस्या आई थी। सबसे बड़ी बात ये है कि हमारे इधर प्रशासन, समाज सेवी एवं विधायक जी ने ऑक्सीजन की कमी नहीं आने दी गई। मेरा भाई संक्रमित हो गया था। मेरे ससुर की इस कोरोना टाइम में पॉजिटिव होने से मौत हुई थी। तमाम सावधानियों के बाद भी मैं खुद पॉजिटिव हो गया था। खुशी इस बात की है उस समय मैं अपने परिवार के जरा भी समय नहीं दे पाया था। अब न सिर्फ परिवार को समय दे पा रहा बल्कि बच्चों के साथ खेल भी पा रहा हूं।
डेढ़ महीने बाद घर पहुंचे, गांव में साफा बांधकर स्वागत
डॉ. आकाश रघुवंशी:
24 साल के डॉ. आकाश रघुवंशी ने कम उम्र में बहुत ही गजब का काम कोरोना टाइम में किया था। डेढ़ महीने तक वे अपने घर ही नहीं गए। सिर्फ फोन पर ही परिवार के लोगों से बातचीत करते रहे। ड्यूटी पर जाने से पहले और आने के बाद फोन पर बात करते थे। डेढ़ महीने बाद शनिवार को जब घर पहुंचे तो उनका स्वागत साफा बांधकर किया। माला डाली।

पिता सुनील रघुवंशी ने गर्व महसूस करते हुए इस टाइम में अच्छा काम करने की तारीफ की। उन्होंने बताया कि 24 घंटे काम रहता था। ऑफिस ही हमारा घर बन गया था उधर ही खाना खाते थे। जब घर पहुंचा तो पिता जी के शब्द थे अब तो सब ठीक है न। पहले सब डर रहे थे लेकिन बाद में सबका सहयोग मिला।

कोरोना के पीक टाइम में ये फॉर्मूला आया काम
कोरोना पीक के दौरान सरकारी अस्पताल के 5 डॉक्टर पॉजिटिव हो गए थे। पहले से अस्पताल में डॉक्टर्स की कमी थी ऐसे में जो डॉक्टर ठीक थे उनके सामने व्यवस्था संभालने का संकट खड़ा हो गया था। बावजूद इसके डॉक्टर्स ने हार नहीं मानी। बल्कि सेवाभाव से काम किया और सभी डॉक्टर ने एक दूसरे का सहयोग किया। ऑन कॉल पर अस्पताल में रहकर ही अपनी सेवाएं दीं। मरीजों की संख्या ज्यादा रहने पर जिस डॉक्टर की ड्यूटी भी नहीं रहती थी वो भी अस्पताल में सेवा दे रहा था।

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