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गुना में जमीन का पट्टा पाने भटक रहा दस्यु:1972 में जेपी के कहने पर किया था समर्पण; जेल में बंद रहने के दौरान बने साधु, साथी आधुनिक वाल्मीकि कहकर बुलाने लगे

गुना4 महीने पहले
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जनसुनवाई में आवेदन देने पहुंचे बाबा परसराम दास। - Dainik Bhaskar
जनसुनवाई में आवेदन देने पहुंचे बाबा परसराम दास।

1972 में जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर समर्पण करने वाला दस्यु अब अपनी जमीन बचाने के लिए दर-दर भटक रहा है। यह जमीन उसे समर्पण करने के बदले में जीवन-यापन के लिए मिली थी। उस जमीन पर अब कुछ दबंग लोगों की नजर है। उसको अभी तक जमीन पर पट्टा भी नहीं मिल पाया है। अपनी जमीन को कब्जे से बचाने के लिए दस्यु ने जनसुनवाई में पहुंचकर कलेक्टर को आवेदन दिया है।

कहानी 1946 में जन्मे प्रताप सिंह की है, जो अब बाबा परसराम दास के नाम से जाने जाते हैं। 1970 में वह दस्यु बने। ग्वालियर, भिंड, दतिया, जालौन इलाके में उनकी गतिविधियां रहीं। दस्यु बने दो वर्ष ही हुए थे कि 1972 में जयप्रकाश नारायण ने सभी से समर्पण करने की अपील की। जेपी की अपील का असर यह हुआ कि इस तरह का काम करने वाले हजारों लोगों ने समर्पण की ठान ली। प्रताप सिंह भी इन्ही में से एक हैं। उन्होंने मुरैना के जौरा में कई अन्य के साथ समर्पण कर दिया। उन्होंने 500 से ज्यादा लोगों के साथ समर्पण किया। उस समय मुख्यमंत्री प्रतापचन्द सेठी हुआ करते थे। उन्हीं के सामने इन सभी ने समर्पण किया।

इसके बाद उन्हें सबसे पहले ग्वालियर केंद्रीय जेल में बंद किया गया। यहां एक वर्ष रहने के बाद उन्हें नरसिंहगढ़ जेल भेज दिया गया। वहां भी वे लगभग डेढ़ वर्ष रहे। यहां से मुंगावली, जिला अशोकनगर(तब गुना) की खुली जेल में रखा गया। उन्हें 20 वर्ष की सजा सुनाई गई थी। उनके साथ डाकू मोहर सिंह और उसके साथियों ने भी समर्पण किया था। मुंगावली खुली जेल में वे 8 वर्ष तक रहे। 15 अगस्त 1980 के दिन इन सभी को जेल से रिहा कर दिया गया।

साथी बुलाते हैं आधुनिक वाल्मीकि

समर्पण के तुरंत बाद ही इन जैसे सभी लोगों को जीवन-यापन के लिए सरकार द्वारा जमीन दी गयी थी। प्रताप सिंह को गुना जिले के कुंभराज में जमीन दी गई। यहां उनका 100×100 का प्लाट है। वर्ष 1973 में ही उन्हें जमीन दे दी गयी थी। जेल में रहने के दौरान ही एक गुरु के संपर्क में आये और ध्यान आदि करने लगे। वहीं से उन्होंने एक गुरु से दीक्षा ली, जिसके बाद उनका नाम बाबा परसराम दस पड़ा। वे दिन भर ध्यान में मग्न रहते, इसलिए उनके साथी उन्हें आधुनिक वाल्मीकि नाम से भी बुलाने लगे थे।

जेल से रिहा होकर आए कुंभराज

1980 में रिहा होने के बाद वे कुंभराज आ गए। यहां अपनी जमीन पर रख कुटिया बनाकर जीवन-यापन शुरू कर दिया। लेकिन उनकी जमीन पर दबंगों की नजर पड़ गयी। आस-पास रहने वाले लोग धीरे-धीरे उनकी जमीन पर कब्जा करने लगे। कलेक्टर को दिए आवेदन में उन्होंने बताया कि कुछ प्रभावशाली लोगों ने उनकी जमीन पर कब्जा कर जमीन के पट्टे तक ले लिए हैं। जबकि उनको अभी तक पट्टा नहीं दिया गया। उन लोगों ने कुछ राजस्व विभाग के अधिकारी-कर्मचारियों के साथ मिलकर जमीन के खसरे में भी बदलाव करा दिए।

चक्कर लगाते हुए हो गए कई साल

बाबा परसराम दास ने बताया कि वह कई वर्षों से जमीन के लिए अधिकारियों-नेताओं के चक्कर लगा रहे हैं। लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। जुलाई महीने में नगरपालिका और तहसीलदार ने उनसे जमीन को खाली करने के लिए कह दिया है, जबकि पूर्व में कलेक्टर ने ही उन्हें उस जमीन का आधिपत्य दिया था। अब उन्हें जमीन से बेदखल करने की कोशिश की जा रही है। आवेदन में उन्होंने मांग की है कि उनकी जमीन उन्हें वापस दिलाई जाए और उसका पट्टा भी उन्हें दिया जाए।

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