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आयोजन:सच्ची मित्रता वही जिसमें समर्पण का भाव हो

गुना2 महीने पहले
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नगर के गुरु महाराज मंदिर पर श्री गुरु महाराज सेवा मंडल द्वारा आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस कथा व्यास पं. अवधेश व्यास ने कथा के आरंभ में भगवान के 16 हजार 108 विवाह का प्रसंग सुनाया। भगवान की आठ मुख्य पटरानी थी। उन्होंने बताया कि भौंमासुर नामक दैत्य ने हजारों कन्याओं के साथ विवाह करने के उद्देश्य से उन्हें बंदी बनाकर रखा था। तब उन कन्याओं के जीवन की रक्षा के लिए भगवान ने उस दैत्य का संहार किया और उन कन्याओं को कैद से बचाया। मगर जब कन्याओं ने कहा कि इतने वक्त परिवार से दूर रहने के बाद उन्हें कौन स्वीकार करेगा, तो उन्हें इस लांछन से बचाने के लिए भगवान ने उन 16100 कन्याओं से विवाह किया। इसके बाद परीक्षित ने सुकदेव से भगवान के भक्त और परम मित्र की कथा सुनाने का आग्रह किया और सुकदेव ने उन्हें सुदामा महाराज की कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि सुदामा नाम के एक गरीब ब्राह्मण जिनकी प्रारंभिक शिक्षा भगवान कृष्ण के साथ एक गुरुकु ल में हुई थी। सुदामा एक विरक्त ब्राह्मण थे। पत्नी के कहने पर भगवान से मिलने गए और जब घर वापस आए, तो भगवान ने कृपा करके उनकी झोपड़ी की जगह आलीशान महल बना दिया। लेकिन आदर्शवादी सुदामा उस महल को त्यागकर उसके नजदीक एक कुटिया बनाकर रहे और जीवन यापन किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान में स्वार्थ की मित्रता रह गई है लेकिन सही मायने में मित्र वही है, जो साथी मित्र के हित के लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी तक दे दे। इसके बाद कथा के मुख्य प्रसंगों को श्रवण कराके कथा सार सुनाया और फिर शाप की अवधि के अनुसार सुखदेव ने वहां से प्रस्थान किया। परीक्षित ने खुद को भगवान में लीन कर लिया और तक्षक नाग ने उन्हें डंसा। पं.अवधेश व्यास ने कथा के अंत में भजनों की वर्षा करके उपस्थित श्रद्धालुओं को झूमने के लिए मजबूर कर दिया। इसके बाद सप्तम दिवस की कथा को विश्राम दिया गया।

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