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मंथन:वीरांगना लक्ष्मीबाई ने एक ऐसा आदर्श स्थापित किया कि हर कोई प्रेरणा ले सकता है

गुनाएक महीने पहले
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  • रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस पर चिंतन हाउस में हुई वर्चुअल चिंतन गोष्ठी
  • राज्य और राष्ट्र से एकात्म स्थापित करने वाली भक्ति व शक्ति दिखाई रानी लक्ष्मीबाई ने

भारतीय इतिहास के पृष्ठ इस बात के गवाह हैं कि इस देश के महान सपूत, वीरांगनाओं ने हंसते-हंसते देश धर्म की खातिर आत्म बलिदान कर दिया। उक्त बात चिंतन हाउस में वर्चुअल चिंतन गोष्ठी में हिउस प्रमुख कैलाश मंथन ने कही।

श्री मंथन ने कहा कि महारानी लक्ष्मीबाई भी अंग्रेजों की षडयंत्रकारी नीति के कारणा जान से हाथ धो बैठी। इतिहास में सन 1857 में मध्यभारत राज्य में रानी के साथ विश्वासघात नहीं होता तो झांसी बुंदेलखंड का इतिहास कुछ और ही होता। लक्ष्मीबाई का शौर्य पराक्रम अलग ही है।

वर्चुअल संगोष्ठी काे संबाेधित करते हुए उन्हाेंने कहा कि वीरांगना नाम सुनते ही हमारे मनोमस्तिष्क में रानी लक्ष्मीबाई की छवि उभरने लगती है। भारतीय वसुंधरा को अपने वीरोचित भाव से गौरवान्वित करने वाली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई सच्चे अर्थों में वीरांगना ही थीं।

वे भारतीय महिलाओं के समक्ष अपने जीवन काल में ही ऐसा आदर्श स्थापित करके विदा हुईं, जिससे हर कोई प्रेरणा ले सकता है। रानी लक्ष्मीबाई के मन में अपने राज्य और राष्ट्र से एकात्म स्थापित करने वाली भक्ति हमेशा विद्यमान रही।

वीरांगना के मन में हमेशा यह बात कचोटती रही कि देश के दुश्मन अंग्रेजों को सबक सिखाया जाए। इसी कारण उन्होंने यह घोषणा की कि मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। इतिहास बताता है कि इस घोषणा के बाद रानी ने अंग्रेजों से युद्ध किया। महारानी लक्ष्मीबाई का जन्म काशी में 19 नवंबर 1835 को हुआ था।

इनके पिता मोरोपंत ताम्बे चिकनाजी अप्पा के आश्रित थे। माता का नाम भागीरथी बाई था। महारानी के पितामह बलवंत राव के बाजीराव पेशवा की सेना में सेनानायक होने के कारण मोरोपंत पर भी पेशवा की कृपा रहने लगी। लक्ष्मीबाई अपने बाल्यकाल में मनु व मणिकर्णिका के नाम से जानी जाती थीं।

महारानी लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथि पर कार्यकर्ताओं द्वारा श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए उनके शौर्य एवं पराक्रम को याद किया गया।

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