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अनुकूल परिस्थितियां:रातापानी अभ्यारण्य में पर्याप्त जलस्रोत, सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध, रातापानी में साल दर साल बढ़ रहा बाघों का कुनबा

मंडीदीप3 महीने पहले
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ओबैदुल्लागंज के अंतर्गत आने वाला रातापानी अभयारण्य बाघों के सबसे खूबसूरत और सुरक्षित आशियानों में से एक है। इसके अलावा यहां बाघों के लिए पानी के पर्याप्त जल स्रोत हैं तो विचरण के लिए 20 से 25 किमी का टेरिटरी एरिया होने के साथ ही पेट भरने आसानी से शिकार भी मिल जाता है। इसके साथ ही सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध के साथ अन्य अनुकूल परिस्थितियां है इसलिए यहां बाघों की संख्या में साल दर साल बढ़ोतरी हो रही है। बाघ संरक्षण और संवर्धन के प्रयासों के चलते वर्ष 2018 की बाग जनगणना के मुकाबले यहां बाघों की संख्या में दोगुना वृद्धि होना बताई जा रही है। वर्ष 2018 में यहां 35 बाघ थे, जबकि अब वन अधिकारी 60 बाघ और 12 शावक होने का अनुमान व्यक्त कर रहे हैं।

बता दें कि रातापानी सेंचुरी 972 वर्ग किमी एरिया में फैली हुई है जहां 60 बाघों के साथ 5 महीने के बाल शावक से लेकर 12 साल तक के 12 बाल शावक भी है। रातापानी अभयारण्य का क्षेत्र भोपाल, सीहोर और रायसेन जिले तक फैला हुआ है। यह जंगल घना होने के साथ ही इसमें वन्य प्राणियों के लिए पानी के पर्याप्त स्रोत है। इस कारण रातापानी अभयारण्य के बाघों का मूवमेंट भोपाल, सीहोर और रायसेन जिले के बाड़ी की सीमा तक बना हुआ है।यहां बाघों ने अभयारण्य के अलग-अलग क्षेत्रों में अपना बसेरा बना रखा है।ओबैदुल्लागंज वन मंडल अधिकारी विजय कुमार कहते हैं कि बाघों के अनुकूल वातावरण, प्राकृतिक वास, पर्याप्त भोजन और सुरक्षा मिलने से बाघों की आबादी में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। इसके साथ ही चुनौतियां भी बढ़ रहीं हैं। अब और अधिक मुस्तैदी से बाघों की सुरक्षा करना भी हमारी जिम्मेदारी है। वहीं रातापानी अधीक्षक प्रदीप त्रिपाठी का कहना है कि पिछले वर्षों में शिकार आदि पर प्रभावी अंकुश लगाने के साथ ग्रासलैंड, वेटलैंड के लिए उचित प्रबंधन किया गया है।

शिकार और वन्य जीव अंग तस्करी है बड़ी चुनौती : तस्कर यूं तो बाघों के रहने का पूरा पता रखते हैं लेकिन रातापानी अभयारण्य के नेशनल हाइवे 12 और 69 से सटे होने के कारण यह चुनौती और अधिक बढ़ जाती है। स्पष्ट है कि रातापानी सेंचुरी के बाघों के जीवन पर भी खतरे की तलवार लटकी हुई है।

रतापानी के बाघों को खतरा भी अधिक है। इसकी वजह रातापानी जंगल के अंदर मानवीय गतिविधियों का बढ़ना है। करीब 972 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले रातापानी बाघ परियोजना में करीब 32 गांव बसे हैं। वैसे तो इन सभी गांवों का विस्थापन रातापानी प्रशासन की प्राथमिकता में हैं, लेकिन प्रारंभ में इनमें से 10 गांवों का विस्थापन जरूरी है।

वन अधिकारियों का 60 बाघ, 12 शावक होने का अनुमान

यहां मानव-बाघ संघर्ष भी है एक बड़ी समस्या

इस सेंचुरी के जंगल में बाघ और मानवों का टकराव बढ़ रहा है। केंद्र सरकार बाघों को संरक्षित करने के लिए प्रोजेक्ट टाइगर चला रही है। पिछले कुछ सालों में मानव और बाघों के बीच शुरू हुआ संघर्ष बढ़ती आबादी के साथ प्राकृतिक संपदा एवं जंगलों के दोहन और नियोजित विकास बाघों को अपना साम्राज्य छोड़ने के लिए विवश कर रहा है।

टाइगर रिजर्व बनने पर इन गांवों का होना है विस्थापन

रातापानी अभयारण्य में टाइगरों के संरक्षण और उन्हें प्राकृतिक वातावरण उपलब्ध कराने के लिए वन विभाग द्वारा 10 गांवों को विस्थापित करने की योजना बनाई है। इन गांवों में करीब 5 हजार से अधिक की आबादी निवास करती है, जिन्हें टाइगर रिजर्व बनने की स्थिति में विस्थापित करना आवश्यक होगा। रातापानी में आने वाले गांव झिरी बहेड़ा, जावरा मलखार, देलाबाड़ी, सुरईढाबा, पांझिर, नीलगढ़, धुनवानी और मंथार को विस्थापित किया जाना है।

यह हैं संभावनाएं

अगर रातापानी अभयारण्य में बाघों की संख्या इसी तरह बढ़ती है तो टाइगर रिजर्व का स्टेटस मिल सकता है, बल्कि इससे काफी राजस्व भी मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है की रातापानी में बाघों की अधिक साइटिंग होगी तो पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। राजधानी के नजदीक और दोनों और नेशनल हाईवे लगे होने के कारण रातापानी वन्यजीव प्रेमियों और पर्यटकों की पसंद है। ऐसे में यहां पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी और इस अभयारण्य का भी विकास होगा।

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