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  • 15 Years Ago, Learned The Bid Of Laboring Laborers, Rs. 10 Lakhs In 2018. Contractor Took Loan Of

सेंटरिंग से शुरुआत, आज कंस्ट्रक्शन कंपनी की मालकिन:5 साल पहले सेंटरिंग कराते-कराते मजदूरों की बोली सीखी, 2018 में 10 लाख रु. का लोन लेकर बनीं कॉन्ट्रैक्टर

भोपाल9 महीने पहलेलेखक: राजेश शर्मा
  • वर्तमान में महिला कॉन्ट्रैक्टर अनघा देशपांडे की कंपनी का टर्नओवर 30 लाख रुपए है

वर्ष 2001 से 2005 तक ठेठ मराठी घरेलू महिला। काम- चूल्हा-चौका, घर संभालना, बच्चों और पति का ध्यान रखना। शादी के बाद दूसरी महिलाओं की तरह ही अनघा देशपांडे का भी रोजाना यही काम था। बावजूद कुछ करने की ललक के चलते आर्किटेक्ट पति श्रीरंग देशपांडे के साथ कंस्ट्रक्शन साइट पर जाने लगीं। मॉनिटरिंग के दौरान मजदूरों की भाषा सीखी।

फिर बिजनेस का विचार आया। 5 साल पहले सेंटरिंग का काम शुरू किया। पति ने भी साथ दिया। 2018 में अनघा 10 लाख रुपए का लोन लेकर खुद कॉन्ट्रैक्टर बन गईं। मेहनत और लगन के बाद उनका बोया बीज 15 साल में वटवृक्ष बन गया। आज वह खुद कंस्ट्रक्शन कंपनी की मालकिन हैं, जिसका टर्नओवर करीब 30 लाख रुपए है।

अनघा बताती हैं, ‘2001 में श्रीरंग देशपांडे से भोपाल में शादी हुई। इसके बाद पति के साथ अकोला अपने ससुराल चली गईं। बाद में 2006 में वापस भोपाल आ गए। वह यहां एक कंपनी में आर्किटेक्ट थे। उन्हें साइट (जहां भवन निर्माण कार्य होता है) की मॉनिटरिंग भी करनी पड़ती थी। चूंकि कई साइट होती थीं, तो वह परेशान हो जाते थे। एक दिन फैसला किया, यदि बैठे-बैठे मॉनिटरिंग ही करनी है, तो घर में बैठने से अच्छा है, मैं भी साइट पर ही बैठ जाऊं।’

शुरू में परेशानी हुई, बाद में इंटरेस्ट आने लगा

वे कहती हैं, ‘पति के साथ मैं भी साइट पर जाने लगी। शुरू में परेशानी आई, अजीब भी लगा, लेकिन धीरे-धीरे इंटरेस्ट आने लगा। मैंने काम के साथ मजदूरों की भाषा भी सीखी। यह सिलसिला कुछ वर्षों तक चला। मैं सेंटरिंग के बारे में पारंगत हो गई। फिर लगा कि खुद का कुछ करना चाहिए, लेकिन कॉन्फिडेंस नहीं था। इस बीच अंशु गुप्ता (जिसे वह मोटिवेटर बताती हैं) ने मुझसे कहा- ऐसा काम करो, जिसमें दूसरों को भी काम दे सको। इसके बाद सेंटरिंग का काम शुरू किया।’

... तब डिप्रेशन में आ गई थी

‘एक बार साइट से सेंटरिंग चोरी हो गई थी। उसी दाैरान सास की तबीयत भी खराब हो गई। तब मैं डिप्रेशन में आ गई थी, लेकिन फैमिली का सपोर्ट मिला। बेटा मुझे प्राउड फील कराता था। बेटे से जब कोई मेरे बारे में कोई पूछता है, तो वह कहता है- मेरी मां ऐसा काम करती है, जो कोई महिला नहीं करती।’

लॉकडाउन में बेचा काढ़ा

‘कोरोना के कारण लॉकडाउन हुआ, तो ऐसा लगा कि सब कुछ खत्म हो रहा है, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। इस बीच आयुर्वेदिक काढ़ा बनाना सीखा और बेचा।’

एक कमरे के निर्माण से शुरू किया काम

‘जब काम मिलने लगा, तो धीरे-धीरे कंस्ट्रक्शन का काम समझ आया। एक बार पति को एक कमरा बनाने का काम मिला, लेकिन उन्हें जबलपुर जाना था। उन्होंने इस काम की जिम्मेदारी मुझे दी। इसके बाद कंस्ट्रक्शन सेक्टर में कदम रखा। पहले छोटे-छोटे काम मिलते थे। फिर कंपनी बना ली। फिलहाल, बड़ा प्रोजेक्ट नहीं है, लेकिन चार-पांच मकान बना चुके हैं।’

हटकर नहीं, लीक पर डटकर काम करें

‘मुझे लगता है, शुरुआत में कोई सपोर्ट नहीं करता। मुझे भी लोग सोशल वर्क की सलाह देते थे, लेकिन मैं अडिग रही। जब एक बार जगह बन जाती है, तो सबकी आपके प्रति सोच बदल जाती है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। लीक से हटकर नहीं, लीक पर डटकर काम करने की जरूरत है।’

गवर्नर ने भी किया सम्मानित

पिछले माह राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने प्रदेश की कुछ कामकाजी महिलाओं के साथ वेबिनाॅर के जरिए बात की थी। अनघा भी उनमें शामिल थीं। उन्होंने कहा था, ‘मैंने इस फील्ड में पहले किसी महिला को काम करते नहीं देखा।’ उन्होंने अनघा को सम्मानित भी किया।

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