19 साल की बेटी भी बच्चों जैसा करती है बर्ताव:अजीब बीमारी वाले 3 भाई-बहन, 19 से 32 की उम्र में घुटनों के बल चलते हैं

भोपाल10 महीने पहले

एक मजदूर परिवार तीन बच्चे ऐसे हैं, जिनकी उम्र 19 से 32 साल के बीच है, लेकिन व्यवहार छोटे बच्चे जैसा है। वे सामान्य बच्चों की तरह हाथ-पैरों के बल चलते हैं और उन्हीं की तरह बात भी करते हैं। ये तीनों भाई-बहन बच्चों के टूटे-फूटे खिलौनों से खेलते हैं। यह परिवार भोपाल के विदिशा में रहता है।

भोपाल के डॉक्टर जीशान हनीफ इन तीनों बच्चों का इलाज कर रहे हैं। उनका कहना है कि इनके ‘उनर टेन’ सिंड्रोम जैसे लक्षणों से ग्रस्त होने की आशंका है। इस बीमारी के मामले आखिरी बार टर्की में साल 2006 में सामने आए थे, जब एक ही परिवार के पांच सदस्य इससे पीड़ित मिले थे।

मजदूर पिता के 7 में से 3 बच्चे दिव्यांग
बच्चों के पिता शफीक खान गांव में ही खेतिहर मजदूरी करते हैं। शफीक के कुल सात बच्चों में से तीन बच्चे दिव्यांग हैं। ये लोग विदिशा जिले के मुहम्मदगढ़ गांव में रहते हैं। बच्चों जैसा व्यवहार करने वाले इन तीनों भाई-बहनों के नाम- रफीक (32 साल), जुबैर (31 साल) और अमरीन (19 साल) हैं। रफीक और जुबेर दोनों भाइयों के बाद चार बच्चे ठीक हुए लेकिन सातवें नंबर पर पैदा हुई बेटी अमरीन शारीरिक और मानसिक रूप से दिव्यांग है।

रफीक और जुबैर।
रफीक और जुबैर।

बीमारी पर एकमत नहीं हैं वैज्ञानिक
डॉ. जीशान हनीफ के मुताबिक, इंटरनेट पर पड़ताल करने पर पता चला कि पहली बार ‘उनर टेन’ के मामले साल 2005 में टर्की में मिले थे। इसमें मरीज हाथ-पैर के बल चलता है। यह ऑटोसोमल रेसेशिव म्यूटेशन है। सेलेब्रल हाईबो प्लेसिया, लॉस ऑफ बैलेंस एंड कॉर्डिनेशन, मेंटल रिटायर्डेशन, हेबुचुअल हेंड एंड फुट क्वाड्रपुडल गेट (दोनों हाथों और पैरों के बल चलना)। इसमें वैज्ञानिकों के अलग-अलग मत हैं।

यह गंभीर बीमारी है..
एक वैज्ञानिक का तर्क है कि इंसानों की उत्पत्ति जानवरों से हुई है, इसलिए वह चिम्पैंजी की तरह चलते हैं। वहीं, दूसरे वैज्ञानिक इस तर्क को खारिज करते हैं। डॉ. जीशान कहते हैं कि यह गंभीर बीमारी है। इस परिवार की आर्थिक स्थिति खराब है। युवा अवस्था में होने के बावजूद यह तीनों भाई-बहन टूटे फूटे खिलौनों से खेलते हैं।

तीनों भाई-बहन इसी तरह रहते हैँ।
तीनों भाई-बहन इसी तरह रहते हैँ।

बच्चों के पिता का दावा- विदिशा जिले में ऐसे कई मरीज
पिता शफीक खान का कहना है कि जन्म के बाद ये तीनों बच्चे सामान्य लगते थे, लेकिन जैसे-जैसे बडे़ हुए तो ये चलने-फिरने के बजाए जमीन या बिस्तर पर पड़े रहते थे। हम सरकारी अस्पताल के कैम्प में दिखाने ले गए तो डॉक्टरों ने कहा कि ये बच्चे ऐसे ही रहेंगे। डॉक्टरों ने न कोई जांच कराई और न ही इलाज किया। विदिशा अस्पताल में दूसरे कई बच्चे भी ऐसी बीमारी से ग्रस्त मिले थे। बच्चों के पिता ने बताया कि उनकी शादी रिश्ते की ममेरी बहन से हुई थी। शादी के समय हम बेगमगंज रहते थे, लेकिन पहले दो बच्चों के जन्म के बाद हम बेगमगंज से यहां मुहम्मदगढ़ में अपनी ससुराल में आकर रहने लगे। पहले दो लड़के और एक लड़की दिमागी तौर पर और शारीरिक रूप से कमजोर हैं।

इसी तरह बच्चों की तरह झुक कर चलना पड़ता है।
इसी तरह बच्चों की तरह झुक कर चलना पड़ता है।

टास्क फोर्स बनाकर एक्सपर्ट्स को अध्ययन करने की जरूरत
एम्स भोपाल के पूर्व निदेशक डॉ. सरमन सिंह कहते हैं कि ऐसे मामले टर्की और बगदाद में मिले थे, लेकिन वैज्ञानिक इसमें एकमत नहीं हैं। इन मरीजों की स्थिति देखकर लगता है कि दोनों भाइयों को यदि फिजियोथैरेपी, ट्रेनिंग और ट्रीटमेंट सपोर्ट दिया जाए, तो ये चलने में सक्षम हो सकते हैं। बहन जरूर सेलेब्रल पाल्सी से ग्रस्त नजर आ रही है। स्वास्थ्य विभाग को मामले में एक्सपर्ट्स की टास्क फोर्स बनाकर इसकी स्टडी करानी चाहिए, ताकि इस केस की सही स्थिति पता लग सके।