हाईकोर्ट का बड़ा फैसला:81 नगरीय निकाय में चुनाव से पहले आरक्षण प्रक्रिया पर हाईकोर्ट की रोक

भोपाल/ग्वालियर9 महीने पहले
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याचिका के निराकरण तक प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव की नहीं होगी घोषणा। - Dainik Bhaskar
याचिका के निराकरण तक प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव की नहीं होगी घोषणा।
  • लगातार दूसरी बार अध्यक्ष पद एससी/एसटी के लिए आरक्षित करने को चुनौती दी थी
  • असर : याचिका के निराकरण तक प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव की नहीं होगी घोषणा

प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव के संबंध में हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है। नगरीय निकायों में अध्यक्ष और महापौर के आरक्षण के लिए पिछले साल 10 दिसंबर को जारी नोटिफिकेशन के उस भाग पर रोक लगा दी है, जिसमें अजा-जजा के लिए लगातार दूसरी बार आरक्षित किया गया है। कोर्ट के आदेश से प्रदेश के दो नगर निगम मुरैना व उज्जैन के महापौर और 79 नगर पालिका व नगर परिषद के अध्यक्ष पद के लिए हुआ आरक्षण प्रभावित होगा।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिका के लंबित होने के चलते नए सिरे से रोटेशन पद्धति को अपनाते हुए आरक्षण करने पर किसी प्रकार की कोई रोक नहीं रहेगी। इसके बाद चुनाव कार्यक्रम घोषित करने के साथ ही चुनाव कराया जा सकेगा। मामले की अगली सुनवाई अप्रैल में होगी। इस फैसले का सीधा असर प्रदेश के नगरीय निकाय चुनाव की घोषणा पर पड़ेगा।

माना जा रहा था कि 15 मार्च तक निकाय चुनाव की घोषणा होती है। लेकिन अब इस प्रकरण का निपटारा हुए बिना नगरीय निकाय के चुनाव की प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती। नगरीय निकायों में महापौर और अध्यक्ष का आरक्षण एक साथ होता है। इसमें आबादी व रोटेशन दोनों को आधार बनाया जाता है।

एडवोकेट मानवर्धन सिंह तोमर की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस शील नागू और जस्टिस आनंद पाठक की डिवीजन बेंच ने कहा कि अभी रोटेशन पद्धति की अनदेखी करते हुए अध्यक्ष पद के लिए आरक्षण किया गया है। इससे एक वर्ग का व्यक्ति लगातार दो बार चुनाव लड़ सकेगा और गैर आरक्षित वर्ग के व्यक्ति को प्रतिनिधित्व करने का अवसर नहीं मिलेगा। इसलिए इस पर अंतरिम रोक लगाई जाती है। दरअसल, हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें मप्र की उन नगर निगम, नगर पंचायत और नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष के लिए हुए आरक्षण को ये कहते हुए चुनौती दी गई कि यह निकाय लगातार दूसरी बार एसटी अथवा एससी वर्ग के लिए आरक्षित किए गए हैं। इसमें उज्जैन और मुरैना नगर निगम के साथ 79 नगरपालिका व नगर परिषद शामिल हैं।

एडवोकेट अभिषेक भदौरिया ने बताया कि नियमानुसार, अध्यक्ष पद का आरक्षण रोटेशन पद्धति अपनाते हुए करना चाहिए था। याचिका में हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच के उस आदेश का भी हवाला दिया गया जिसमें डबरा नगर पालिका और इंदरगढ़ नगर परिषद के अध्यक्ष पद के आरक्षण पर रोक लगा दी गई है। दोनों जगह अध्यक्ष का पद एससी वर्ग के लिए लंबे समय से आरक्षित किया जा रहा है।

डबरा और इंदरगढ़ के मामले में अतिरिक्त महाधिवक्ता अंकुर मोदी ने कोर्ट को बताया कि चूंकि, कोर्ट ने केवल दो निकाय के अध्यक्ष पद के लिए किए गए आरक्षण पर ही रोक लगाई है। इसलिए शासन ने शेष स्थानों पर चुनाव की प्रक्रिया शुरू कर दी है। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि अभी चुनाव कार्यक्रम घोषित नहीं किया गया है।

प्रदेश की स्थिति

कुल निकाय 407 नगर निगम 16 चुनाव होना हैं 344

  • कितने नगर पालिक/ परिषद के चुनाव पर लगी रोक 79
  • कितने नगर निगम के चुनाव पर लगी रोक 02

एक्सपर्ट व्यू : सरकार के पास ये 3 विकल्प

1. ये अंतरिम आदेश है। सरकार कोर्ट में जवाब पेश करते हुए आदेश को वापस लेने की गुहार लगा सकती है। 2. सरकार को यदि ये लगता है कि आरक्षण प्रक्रिया में किसी प्रकार की त्रुटि नहीं की गई है और कोर्ट इस स्थिति में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। ऐसे में सरकार सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर कर सकती है। 3. आरक्षण संबंधी तीनों याचिकाओं की एक साथ सुनवाई हो। स्पेशल बेंच का गठन किया जाए। इससे तीनोें याचिकाओं का जल्द निराकरण हो सकेगा।

जैसा सीनियर एडवोकेट आरएन सिंह, पूर्व महाधिवक्ता, मप्र ने बताया

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