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जिंदा थे तब वृद्धाश्रम भेजा:मरने के बाद दिखावे के अंतिम संस्कार के लिए घर ले आए, ताकि संपत्ति के लिए डेथ सर्टिफिकेट मिल जाए

भोपाल3 महीने पहलेलेखक: वंदना श्रोती
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शहर के तीन वृद्धाश्रमों आसरा, अपना घर और आनंदधाम में 5 साल में ऐसे 30 से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं। - Dainik Bhaskar
शहर के तीन वृद्धाश्रमों आसरा, अपना घर और आनंदधाम में 5 साल में ऐसे 30 से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं।

जीते जी अपने बुजुर्गों को बच्चे वृद्धाश्रम छोड़ जाते हैं, लेकिन मरने के बाद उनके अंतिम संस्कार के लिए वही बच्चे उन्हें घर ले जाने के लिए उतावले दिखाई देते हैं। क्योंकि, उन्हें संपत्ति के नामांतरण के लिए उनका मृत्यु प्रमाण पत्र चाहिए होता है। 5 साल में ऐसे ही करीब 30 से ज्यादा मामले शहर के 3 वृद्धाश्रमों अपना घर, आनंद धाम और आसरा से सामने आए हैं।

वृद्धाश्रम संचालकों ने बताया कि कई बार देखने में आया है कि बच्चे जीते जी अपने बुजुर्गों को वृद्धाश्रम में रखते हैं, लेकिन उनकी मौत के बाद वे ही बच्चे समाज को दिखाने और मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए बुजुर्गों का अंतिम संस्कार घर में करने की जिद करने लगते हैं। पिछले पांच सालों में तीनों वृद्धाश्रम में 30 से अधिक बुजुर्गों को उनके मरने के बाद घर नसीब हुआ।

वृद्धाश्रम संचालकों का कहना है कि वृद्धाश्रम के लिए बनाए गए प्रोटोकॉल के मुताबिक यदि कोई बच्चा अपने बुजुर्ग का अंतिम संस्कार करने उनका शव ले जाना चाहता है तो संचालक को शव को तब तक संरक्षित तक रखना पड़ता है, जब तक वे नहीं आ जाते। आनंदधाम वृद्धाश्रम के सचिव आरआर सुरंगे ने बताया कि बुजुर्गों के बच्चे वृद्धाश्रम में रखा पूरा सामान भी साथ ले जाते हैं।

अपना घर वृद्धाश्रम की माधुरी मिश्रा का कहना है कि कई बुजुर्ग ऐसे थे, जो आखिरी समय में बच्चों को याद करते रहे, लेकिन वो नहीं आए। मौत की सूचना के बाद वे आए और अंतिम संस्कार के लिए शव लेकर चले गए। आसारा वृद्धाश्रम की मैनेजर राधा शर्मा ने बताया कि उनके यहां हाल ही में एक बुजुर्ग की मौत हुई। उनके बच्चे आकर उनका शव ले गए।

विदेश गए तो पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ गए, मौत हुई तब लेने आ गए

मुरारीलाल शर्मा को उनके बच्चे वृद्धाश्रम यह कहकर छोड़कर गए थे कि वे कुछ काम से विदेश जा रहे हैं जब वे लौटकर आएंगे तो वापस ले जाएंगे। इसके बाद मुरारीलाल ने बच्चों को घर ले जाने के लिए कई बार फोन लगाया, लेकिन बच्चों ने हमेशा कोई न कोई बहाना बना दिया, जबकि बच्चे विदेश से वापस आकर बस्तर में रह रहे थे।

जैसे ही उनकी मौत हुई और इसकी जानकारी वृद्धाश्रम संचालक ने दी तो वे तुरंत आ गए। संचालकों ने भोपाल में ही अंतिम संस्कार करने की बात की तो उन्होंने मना कर दिया। उनका कहना था कि वे उनका अंतिम संस्कार अपने पुस्तैनी मकान में ही करेंगे।

मौत के बाद में मकान बेटे ने अपने नाम करा लिया

आशा गोपा के नाम पर कोटरा में एक मकान था। उनके बेटे और बहू ने उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ दिया। उन्होंने बताया कि वे मुंबई में शिफ्ट हो रहे हैं। छोटा मकान होने की वजह से वे मां को साथ नहीं ले जा सकते। जैसे ही बड़ा मकान लेंगे वैसे ही उन्हें साथ ले जाएंगे। 3 साल तक वे जिंदा रहीं। उनकी मौत की खबर सुनने के बाद दोनों मुंबई से आकर शव ले गए। बाद में पता चला कि मृत्यु प्रमाण पत्र लेने के बाद उन्होंने मकान अपने नाम पर करके उसे बेच दिया।

बेटी विदेश चली गई- जमींदार परिवार से थीं अम्मा तीन दिन तक संरक्षित रखा शव

आजमगढ़ की रहने वालीं सुजाफी सिंह को वृद्धाश्रम में रखकर उनकी बेटी विदेश चली गई। बेटा-बहू उन्हें अपने साथ नहीं रखना चाहते थे, जबकि वह एक जमींदार परिवार से थीं। उनकी मौत के बाद बच्चों ने कहा कि जब तक वे नहीं पहुंचते तब तक उनका अंतिम संस्कार नहीं करना।

उनकी शव को 3 दिन तक संरक्षित करके रखा गया। इसके बाद उनके बच्चे शव को उनके पुस्तैनी गांव ले गए। कई लोगों की उपस्थिति में उनका अंतिम संस्कार किया गया। जिसके फोटो उनके बच्चों ने वृद्धाश्रम संचालक को भेजे थे।

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