​​​​​​​IIT टॉपर पति-पत्नी बने किसान:अमेरिका से MP लौटते ही छोड़ी करोड़ों के पैकेज वाली जॉब, जानिए- क्यों चुनी खेती

भोपाल5 महीने पहलेलेखक: विजय सिंह बघेल

टेक्निकल फील्ड में डिग्री-डिप्लोमा कर जॉब खोजने वाले हजारों यूथ मिल जाएंगे, लेकिन हम आपको ऐसे आईआईटियंस गोल्ड मेडलिस्ट कपल के बारे में बता रहे हैं, जिन्होंने डेढ़ करोड़ के पैकेज की जॉब छोड़ दी। बेंगलुरु में जॉब के बाद दोनों उज्जैन में डेढ़ एकड़ जमीन पर पर्मा कल्चर फार्मिंग कर रहे हैं। वे फल, सब्जियां, दालें और अनाज उगा रहे हैं। एग्रो टूरिज्म के कल्चर को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने सोशल साइट्स पर ब्लॉगिंग और चैनल बनाए हैं। ये कपल हैं अर्पित माहेश्वरी और साक्षी माहेश्वरी। आइए जानते हैं कि आईआईटी टॉपर्स कैसे बन गए किसान…

खबर आगे पढ़ने से पहले इस पोल पर अपनी राय दे सकते हैं...

मैं और मेरी पत्नी दोनों IIT से कंप्यूटर इंजीनियर हैं। हम 2016 में दक्षिण अमेरिका की यात्रा पर गए थे। तब हम अपनी नौकरी से एक साल की लीव पर थे। इस दौरान दुनिया के सबसे खूबसूरत जंगलों, द्वीपों और पहाड़ों पर देखा कि विकास और आधुनिकीकरण के नाम पर हमने बिना सोचे प्रकृति का कितना शोषण किया है। डेवलपमेंट के नाम पर लाखों पेड़ों की बलि देकर सीमेंट-कंक्रीट के जंगल खड़े किए जा रहे हैं। ज्यादा उपज के चक्कर में बेतहाशा पेस्टिसाइड्स का यूज किया जा रहा है। हमें लगा कि ऐसा ही चलता रहा, तो आने वाले समय में प्रकृति खतरे में पड़ जाएगी। इस सोच ने हमें अंदर से झकझोर कर रख दिया।

उसी समय तय कर लिया कि हमें अपना बाकी जीवन प्रकृति के साथ तालमेल बैठाने के बेहतर तरीके की तलाश में बिताना है। हमें ये नहीं पता था कि क्या करेंगे और कैसे करेंगे, लेकिन इतना तो तय हो गया था कि कुछ अलग करने की जरूरत है। करोड़ों के पैकेज को छोड़कर हम निकल पड़े एक नई दुनिया बसाने, जहां पैसे और स्टेटस से ज्यादा जरूरी रहेगा हमारा स्वास्थ्य और खुशी। इसके बाद हमने नौकरी छोड़कर प्रकृति से जुड़ने के लिए स्थाई खेती करने का फैसला कर लिया।

मैं राजस्थान के जोधपुर सिटी का रहने वाला हूं। IIT मुंबई से कम्प्यूटर इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन किया। एंट्रेंस एग्जाम में ऑल इंडिया में सेकंड रैंक थी। मुंबई में फिजिक्स ओलंपियाड 2007 में साक्षी से मुलाकात हुई थी। इस ओलंपियाड में दोनों को गोल्ड मेडल मिला था। साक्षी ने IIT दिल्ली से ग्रेजुएशन किया है। साल 2013 में हमारी शादी हुई। दोनों ने बेंगलुरु में जॉब की और फिर अमेरिका चले गए। वहां से लौटे तो उज्जैन जिले के बड़नगर कस्बे में डेढ़ एकड़ जमीन खरीदकर खेती शुरू कर दी।

हम स्थाई खेती (पर्मा कल्चर) का मॉडल तैयार करने में जुटे हैं। पर्मा कल्चर कॉन्सेप्ट में हम बायो डायवर्सिटी सिस्टम के मुताबिक खेती कर रहे हैं। हमने डेढ़ एकड़ जमीन पर 75 प्रकार के पौधे लगाए हैं। इनमें आधे फलदार हैं, केला, पपीता, अमरूद, सीताफल, अनार, संतरा, करोंदा, पालसा, गूंदा, शहतूत जैसे। एक फलदार पौधे के साथ चार जंगली पौधे सपोर्ट ट्री के तौर पर लगाए हैं, जो जमीन की उर्वरा शक्ति को बढ़ाएं। उदाहरण के तौर पर काली मिट्‌टी में एक फलदार पौधे के साथ करंज के पेड़ का लगाया है। करंज हवा से नाइट्रोजन खींचकर जमीन में ट्रांसफर करता है। करंज के पत्तों से बने काढ़े से पत्तों में कीड़े लगने पर छिड़काव किया जाता है। बायोमास के तौर पर करंज की टहनियों को काट-काट कर फलदार पौधों के पास बिछा देते हैं। यह पत्तियां जमीन में खाद का काम करती हैं। ऐसे जैव विविधता के आधार पर खेती के स्थाई सिस्टम का मॉडल बनाकर दुनिया के सामने पेश करना चाहते हैं।

दंपती खेत में ही कच्चा घर भी बनाया हुआ है।
दंपती खेत में ही कच्चा घर भी बनाया हुआ है।

Permaculture नाम से एक सोच और तकनीक है, जो ऑस्ट्रेलिया से विश्वभर में फैली है। इसमें जमीन को एक ऐसे तरीके से विकसित किया जाता है कि निरंतर जमीन उपजाऊ बनी रहे और बंजर न बने। हमारे एग्रो टूरिज्म को देखने दिल्ली, मुंबई, गोवा, मणिपुर से लेकर विदेशों के लोग भी आ रहे हैं।

मैं और मेरी पत्नी शहरी हैं। 5 साल पहले तक कभी खेत में पांव नहीं रखा था। शुरुआत करने के लिए देश के जैविक खेतों में हमने वालंटियर के तौर पर काम किया। बेंगलुरु जैसे बड़े शहर के जीवन को छोड़कर एक कस्बे में रहना, हमारे लिए बिल्कुल नया था। दिल्ली में पली-बढ़ी साक्षी ने कभी नंगे पैर 10 कदम भी नहीं रखे, वो अब घंटों खेतों में काम करती है। लोग जब हमारे कृषि फार्म पर आते हैं, तो उसे देखकर चौक जाते हैं। हम तीन घंटे की ऑनलाइन जॉब करते हैं, उससे आर्थिक जरूरतें पूरी होती हैं, बाकी समय खेती को दे रहे हैं।

बड़नगर में काली मिट्टी मिली, इसलिए यहीं रहने लगे
कपल का बड़नगर में दोस्त रहता है। यहां इनका आना-जाना लगा रहता था। कपल ने और भी जगह जमीनें देखीं, उन्हें बड़नगर में जमीन काली मिट्‌टी की मिल गई तो उन्होंने यहीं खेती करने का फैसला लिया। वे जो भी फसल उगाते हैं, उसका कमर्शियल यूज नहीं करते। खुद उगाते, खाते हैं। दोस्त-रिश्तेदार आते हैं तो उन्हें भी दे देते हैं। खर्च निकालने के लिए दोनों 3 घंटे की ऑनलाइन पार्टटाइम जॉब करते हैं।