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'महाराजा' से ज्यादा ठाठ-बाठ उनके समर्थक मंत्री के:इनडायरेक्ट चुनाव पर अड़े सरकार 'बेपटरी' मंत्री; SP पर भड़कना मंत्री को पड़ा महंगा...

भोपालएक महीने पहलेलेखक: राजेश शर्मा

आपने सनी देओल का ये मशहूर डॉयलॉग तो सुना होगा... तारीख पर तारीख... तारीख पर तारीख...। कुछ इसी तर्ज पर मध्यप्रदेश में चला प्रस्ताव पर प्रस्ताव... प्रस्ताव पर प्रस्ताव...। दरअसल प्रदेश में होने वाले नगरीय निकाय चुनाव को लेकर सरकार फुल कंफ्यूज नजर आई। इस बात को लेकर कि महापौर और अध्यक्षों को सीधे जनता चुने या फिर पार्षद? इसी को लेकर करीब 5 दिन उठापटक चली। जाहिर है बीजेपी सत्ता और संगठन के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। इसे लेकर शिवराज कैबिनेट में मतभेद भी उभरा।

आधे से ज्यादा मंत्री चाहते थे कि चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से हो। इन मंत्रियों में सिंधिया समर्थक मंत्री ज्यादा थे। जिनकी अगुवाई एक कद्दावर मंत्री कर रहे थे। ये वही मंत्री हैं, जिनकी अभी सरकार से पटरी नहीं बैठ रही हैं। उन्होंने सबसे पहले प्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव करने का विरोध किया था। ‘सरकार’ भी ऐसा ही चाहते थे। जबकि संगठन की मंशा प्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव की थी। इस पूरे ऐपीसोड में बीजेपी के अंदर गुटबाजी साफ दिखाई दी।

सुना है कि इस मुद्दे पर सत्ता-संगठन की बैठक में यह मंत्री इन-डायरेक्ट चुनाव पर अड़ गए। उन्होने यहां तक कह दिया कि नगरीय निकायों में भी पंचायतों की तरह बिना चुनाव चिन्ह के चुनाव कराए जाएं। ये भी सुना है कि वो बीच बैठक से उठकर चले गए थे। इससे पहले कि कोई नया विवाद खड़ा हो, सरकार ने रात में ही नया अध्यादेश (प्रत्यक्ष प्रणाली) तैयार कर राजभवन भेजा गया। लेकिन मामला सुलझने के बजाय उलझ गया। ऐसे में ‘सरकार’ ने बीच का रास्ता निकाला। महापौर का डायरेक्ट और नगर पालिका-नगर परिषदों का इनडायरेक्ट चुनाव होगा। यानी न तुम जीते-न हम हारे। ‘सरकार’ का रुतबा भी कायम।

यहां के हम सिकंदर…

मध्यप्रदेश में लोकल चुनाव का मौसम आते ही हर कोई हुंकार भर रहा है। विपक्षी हो या सत्ताधारी… सब दम लगा रहे है। सत्ताधारी दल के नेता तो अपने आकाओं को ही चुनौती दे रहे हैं। दरअसल स्थानीय निकाय चुनाव को ध्यान में रख मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों कई शहरों में विकास कार्यों का शिलान्यास और भूमिपूजन किया। खरगोन के भीकनगांव में नगर परिषद भवन का भूमिपूजन सहित कई अन्य कार्य भी इस सूची में शामिल थे। लेकिन यहां एक दिन पहले ही प्रभारी मंत्री, स्थानीय सांसद व नगर परिषद अध्यक्ष की मौजूदगी में भूमिपूजन कर दिया गया।

यह जानकारी मंत्रालय में पहुंची तो स्थानीय अधिकारियों से सवाल-जवाब हुए। सुना है कि जब यह बात इन नेताओं तक पहुंची तो इनमें से एक ने कहा- यहां के हम सिंकदर हैं। हमें चुनाव लड़ना है। भोपाल से आकर कोई वोट नहीं मांगेगा। यह जवाब अफसरों ने सरकार तक पहुंचा दिया। अब देखना है कि इसका असर क्या होगा?

गुरु पर भारी चेला

मध्यप्रदेश की राजनीति में अब भी भोपाल स्थिति सिंधिया के सरकारी बंगले की चर्चा हो रही है। इसकी शान-शौकत पर 50 लाख रुपए से ज्यादा खर्च हुआ है। लेकिन सिंधिया के कट्टर समर्थक एक मंत्री उनसे दो कदम आगे निकल गए। वो 4 इमली इलाके में रहते हैं। सुना है कि उनके बंगले में किए कामों का बिल 1 करोड़ 18 लाख रुपए का बन गया है। सुना है कि सार्वजनिक तौर पर भले ही मंत्रीजी सिंधिया के समर्थक हैं, लेकिन पर्दे के पीछे उन्होंने ‘सरकार’ से भी सेटिंग कर ली है। मतलब साध लिया है। यही वजह है कि मंत्रीजी पर ‘सरकार’ मेहरबान है।

पूर्व मंत्री के दामाद पर भड़की महिला मंत्री

शिवराज सरकार में महिला मंत्री एक IAS और IPS अफसर पर जमकर भड़क गईं। हुआ यूं कि विंध्य के एक जिले में बैठक चल रही थी। मंत्री ने जिला पंचायत के सीईओ और एसपी पर भ्रष्टाचार करने का सीधा आरोप लगा दिया। इस पर एसपी तो कुछ नहीं बाेले, लेकिन सीईओ ने दो टूक कह दिया- आप बेवजह आरोप लगा रहीं है। यदि ऐसा है तो प्रमाण दें। इस पर मंत्री भड़क गई और कहा, आप लोगों की शिकायत मुख्यमंत्री से करूंगी। फिर क्या था, सीईओ साहब यह कहते हुए बैठक छोड़कर चले गए कि अब आपकी बैठक में कभी नहीं आऊंगा। सुना है कि मंत्री भोपाल पहुंचकर मुख्यमंत्री से शिकायत करती, उससे पहले उनकी ही शिकायत पहुंच गई। यह शिकायत एक पूर्व मंत्री ने की, जिसके दामाद इस जिले के एसपी हैं।

और अंत में…

पुरानी अनबन पड़ी भारी, रॉ में जाने का टूटा सपना

खुन्नस… शब्द तो छोटा सा है… लेकिन कभी-कभी बड़े नुकसान कर देता है। कब कौन किसी बात को पाल ले। पता नहीं चलता। मध्यप्रदेश में एक आईपीएस अफसर ऐसी ही पुरानी अनबन या यूं कहे खुन्नस भारी पड़ गई, इतनी की उनका खुफिया एजेंसी रॉ में काम करने का सपना टूट गया। दरअसल इस अफसर को प्रतिनियुक्ति पर केंद्र सरकार में पदस्थ करने का प्रस्ताव राज्य सरकार के पास आया था, लेकिन इसकी अनुशंसा नहीं की गई। सुना है कि इस अफसर की कुछ समय पहले एडीजी स्तर के अफसर से किसी बात को लेकर अनबन हो गई थी।

इस अफसर ने केंद्र के प्रस्ताव के जवाब में लिखा- एसपी रैंक के इस अफसर की राज्य में जरूरत है। लिहाजा उन्हें राज्य में पदस्थ रखा जाना चाहिए। बता दें कि यह अफसर फिलहाल लूप लाइन में पदस्थ है। इसकी वजह यह है कि इस अफसर की कार्यशैली से नेता खुश नहीं है। एक बार उन्होंने पूर्व मंत्री के खिलाफ ही एफआईआर दर्ज करने की तैयारी कर ली थी। ऐसा हो पाता, उससे पहले ही उनका तबादला आदेश जारी हो गया था।