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  • Bhopal Gas Tragedy 37 Years The Eyewitnesses Said People Were Running Like A Flood Of Storms; The One Who Fell Did Not Get Up; In The Ears, Only 'Ya Allah, Oh God Give Death' Was Heard.

भोपाल गैस त्रासदी के 37 साल:चश्मदीद बोले- लोग सैलाब की तरह भाग रहे थे; जो गिरा उठा नहीं; एक ही आवाज ‘या अल्लाह मौत दे दे'

भोपाल8 महीने पहलेलेखक: आनंद पवार

2-3 दिसंबर 1984 की रात। जहरीली गैस यूनियन कार्बाइड का रिसाव। इस खौफनाक रात को याद कर लोग 37 साल बाद आज भी सिहर उठते हैँ। उस रात ने हजारों जिंदगियों को लील लिया। कई परिवारों की पीढ़ियां तबाह कर दीं। कई को जिंदगी भर का जख्म दे दिया। इस घटना को याद कर रशीदा बी बताती हैं कि उस रात लोग तूफान के सैलाब की तरह भाग रहे थे। जो गिरा फिर उठा नहीं। उस रात लोग मौत की दुआ मांग रहे थे। क्योंकि उस रात जिंदगी से ज्यादा मौत प्यारी लग रही थी।

हादसी की कहानी- चश्मदीद की जुबानी

भोपाल गैस हादसे की चश्मदीद रशीदा बी आज तक उस रात का मंजर नहीं भूल पाई हैँ। रशीदा बताती हैं कि 2 दिसंबर 1984 की रात से पहले हमें नहीं मालूम था कि भोपाल में यूनियन कार्बाइड नाम का कारखाना भी है। हम परदे में रहते थे। घर में बीड़ी बनाते थे। उस रात काम करते-करते रात 1 बज गए थे। हम सोने की तैयारी में थे, तभी ननद का लड़का उठा। बोला- बाहर धुंआ धुआं हो गया है। उसने दरवाजा खोला, तो आंख से आंसू आने लगे। नाक से पानी बहने लगा। हम थाना तलैया के पीछे रहते थे। वहां से आवाज आने लगी भागो भागो। बाहर का नजारा चौंकाने वाला था। थाना खाली था।

हमने देखा कि लोग सैलाब की तरह भागते आ रहे हैं। सब कह रहे थे कि भागो सब मर जाएंगे। हम ज्वाइंट फैमिली में रहते थे। हम सब भी भागने लगे। आधा किमी भी नहीं चल पाए कि आंखें बड़ी-बड़ी हो गईं। सांस लेना मुश्किल हो गया था। लोग स्टेशन की तरफ से भागते आ रहे थे। जो गिर गया, वह उठा नहीं। मां की गोद से बच्चा छूटा, तो उसे उठाया नहीं। वह कयामत का दिन था। आंखें थोड़ी सी भी खुलती थीं, तो लगता था लाशें ही लाशें पड़ी हैं। कानाें में बस एक ही आवाज आती थी ‘या अल्लाह मौत दे दें’ , ‘हे भगवान मौत दे दे’। उस दिन मौत प्यारी लग रही थी। ऐसा लगता था, जो मरा उसे सुकून मिल गया। किसी को उसका इलाज नहीं मालूम था।

एकदम से ऐलान हुआ कि यूनियन कार्बााइड की गैस बंद हो गई है। घरों को वापस लौट जाएं। ना आंखों से दिख रहा था और ना सांस लेने की ताकत थी। फिर गाड़ियां आईं। इसमें बैठा कर अस्पताल ले जाना शुरू किया। हमें जहांगीराबाद पुलिस अस्पताल ले जाया गया। वहां डॉक्टर परेशान थे कि इनको दे क्या? कोई आईड्राप डाल रहा, कोई इंजेक्शन लगा रहा, तो कोई बोतल लगा दिया। किसी को नहीं मालूम नहीं था, इसका इलाज क्या है। ऐसे ही करते-करते सुबह हो गई। अस्पताल में लाशें पड़ी थीं। जो आ रहा था, उसकी लाश ही बाहर जा रही थी। इस तरह सिलसिला चलता रहा। दो-ढाई बजे उन्होंने गाड़ियों में बैठा कर हमें घर पहुंचा दिया।

4 तारीख की सुबह जब आंख खुली, तो परिवार के कई सदस्य नहीं थे। हमने हमीदिया नहीं देखा था। कई लोगों ने बताया कि वहां लाश पड़ी है। जाकर देखा, तो एक के ऊपर एक लाश पड़ी थीं। वहां घर वालों को ढूढंना शुरू किया, तो मेरे पिताजी मिले। 5 दिसंबर को पता चला कि जेठ के परिवार के सदस्यों को किसी ने बरेली के अस्पताल में छोड़ दिया है। उस समय का हादसा देख कर घबराहट बहुत थी।

फिर अचानक ऐलान हुआ कि 16 दिसंबर को भोपाल खाली हो रहा है। फिर हम सोहागपुर चले गए। 6 महीने तक नहीं लौटे। भोपाल आने को कोई तैयार नहीं था। कुछ भी हो जाए, लेकिन भोपाल नहीं जाएंगे।

सप्ताहभर तक श्मशान में जलती रही लाशें: प्रमिला

जेपी नगर निवासी प्रमिला शर्मा ने बताया कि हादसे के वक्त वह 12 साल की थीं। हम सोने की तैयारी कर रहे थे, तभी बाहर शोर मचने लगा। लाइट नहीं दिख रही थी। सभी इधर-उधर भाग रहे थे। उस रात कोहरा छा गया था। आंखों में मिर्ची जैसी लग रही थी। हम डीआईजी बंगले की तरफ भाग गए। बाद में आकर देखा, तो चारों तरफ लाशें पड़ी थीं। जानवर की तरह इंसानों के शव दिख रहे थे। हमारे घर के पीछे मरघट में उस समय सप्ताह भर तक लाशें जलती रहीं। बदबू के मारे हम खाना भी नहीं खा पाते थे। मुझे सांस लेने की दिक्कत होने लगी। जो अब मेरे लड़के में भी दिखने लगी है। उसकी तेज सांस फूल रही है। हम 6 भाई-बहन थे। मेरी एक बहन की मौत हो गई। एक भाई का हार्ट का ऑपरेशन हो गया। सरकार से मांग है कि हमें सही इलाज उपलब्ध कराएं।

रोजगार का इंतजाम करे सरकार

जेपी नगर की रहने वाली शकीला बी ने बताया कि रात को गैस निकली, तो पता नहीं चला। दरवाजा खेला, तो लाइट बंद हो गई। किसी से कुछ पूछे, तो कोई कुछ बता नहीं रहा था। मैंने अपने लड़के को नाले के पास फेंक दिया। सुबह पता नहीं किसी ने लाकर दिया। मेरा छोटा लड़का बीमार रहता है। कमाने वाला वही है। हमें कुछ नहीं मिल रहा। क्या खाएं हम लोग। कमाने वाले ही ठीक नहीं है। सरकार कोई परवाह नहीं कर रही। सरकार हमारे रोजगार के इंतजाम करें।

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