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  • Both Kidneys Impaired, Langs Contained 500 ML Of Water; Stayed On Ventilator For 10 Days But Did Not Lose Heart

45 दिन के संघर्ष के बाद कोरोना को हराया:दोनों किडनी खराब, लंग्स में 500 एमएल पानी था; 10 दिन वेंटिलेटर पर भी रही लेकिन हिम्मत नहीं हारी

भोपाल5 महीने पहलेलेखक: स्मृति सकरगाये
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मन में है विश्वास... पूरा है विश्वास हम होंगे कामयाब एक दिन...यही जिंदगी को जीने का फलसफा है। मुझे पूरा यकीन था कि मैं कोरोना को जरूर हरा दूंगी। मेरे साथ मेरे दोनों बच्चों का प्रेम और पति का विश्वास था। पहले मेरे पति सुबोध कोरोना पॉजिटिव हुए। मैंने उन्हें तत्काल नोबेल अस्पताल में एडमिट कराया। कोविड गाइडलाइन के अनुसार मैंने भी अपना कोरोना टेस्ट करवाया। मेरी उम्र 42 साल है। 7 जनवरी की शाम को मेरी रिपोर्ट पॉजिटिव आई। पहले तो मैं थोड़ा सहमी। सच मानिए डर गई। अनजानी आशंकाओं से सहम गई फिर मैंने अपने बच्चों का चेहरा देखा और हिम्मत जुटाई।

धीरे-धीरे मुझे सांस लेने में तकलीफ शुरू हुई और मैं तुरंत सकलेचा अस्पताल में जाकर एडमिट हुई। मेरी हालत धीरे-धीरे बिगड़ने लगी। दो साल पहले जब मुझे सांस लेने में तकलीफ हुई थी तो चेकअप करवाया था। तब डॉक्टरों से पता चला था कि मेरी दोनों किडनियां फेल हो चुकी है। तबसे मेरा डायलिसिस चल रहा है। ऐसे में मेरे सामने बड़ा चैलेंज था कि मैं कैसे रिकवर हो पाऊंगी। लेकिन डॉक्टर्स की टीम ने मुझे हिम्मत दी। मुझे वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा। 10 दिन तक वेंटिलेटर पर रहने के बाद जब होश आया तो पता चला कि मेरे लंग्स में 500 एमएल पानी भर गया था।

डॉक्टर्स की टीम ने पूरे विश्वास के साथ इलाज किया। इसके बाद मुझे आईसीयू में एडमिट किया गया। आईसीयू में मैं बिल्कुल अकेली थी, क्योंकि पति नोबेल अस्पताल में एडमिट थे। मेरा मनोबल कम न हो और इसके लिए पति ने खुद को नोबेल अस्पताल से सकलेचा अस्पताल में शिफ्ट करवा लिया। बच्चों की कहीं हर बात कान में पूरे समय गूंजती कि मां आपको हमें अकेला छोड़कर नहीं जाना है। आपको हमारे लिए जीना ही होगा। बस, उनकी कही यह बात मेरे लिए जीवन अमृत साबित हुई। जब भी अस्पताल में आसपास के मरीजों को तड़पता हुआ देखती तो खुद को निगेटिविटी से दूर रखने के लिए प्रवचन सुनती या फिर भजन सुनने लगती।

इस बहाने खुद को जीवट बनाती। इच्छाशक्ति को मजबूत करती। इसके अलावा परिवार की खट्टी मीठी यादों को अपनी स्मृतियों में लाती। हर पल यही सोचती कि बच्चों की दुआओं और उनके विश्वास ने मुझे एक बार फिर नया जीवन दिया है। मुझे जीना है। लगभग 45 दिन की जद्दोजहद के बाद मैं अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर पहुंची। अब मेरे परिचय के जो भी लोग हैं, उनसे बातचीत कर उन्हें मोटिवेट कर रही हूं। ताकि वे कोरोना से डरें नहीं। भय और तनाव न पालें। चुनौती चाहे जितनी बड़ी हो लेकिन हौसला है तो जीत तय है।

माता-पिता के साथ 6 महीने की मासूम ने भी दी कोरोना को मात

ये है 6 महीने की निहारिका... मां रश्मि और पिता अजीत पाराशर के साथ ये भी कोरोना पॉजिटिव हो गई। ये तीनों 17 अप्रैल को भानपुर स्थित अस्पताल में एडमिट हुए। अजीत ने बताया कि रश्मि को 30% संक्रमण था। वहीं, मुझे और निहारिका को माइल्ड संक्रमण था। लेकिन अब हम तीनों स्वस्थ हैं और अस्पताल से डिस्चार्ज हो चुके हैं।

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