• Hindi News
  • Local
  • Mp
  • Bhopal
  • Calling The Mother And Asked For Good Food From The Market, The Father Said With Folded Hands, Do Not Leave The Children Alone

भोपाल में स्टूडेंट ने लगाई फांसी:बाजार से लौटी मां तो फंदे से लटका मिला बेटा, पिता ने हाथ जोड़कर कहा- बच्चों को अकेला न छोड़ें

भोपाल4 महीने पहले

भोपाल में 6वीं क्लास के स्टूडेंट ने फांसी लगा ली। घटना के वक्त वह घर में अकेला था। मां, 16 साल की बेटी के साथ उसकी आंसरशीट जमा करने स्कूल गई थी। बाजार में उसके पास बेटे का फोन आया। बेटे ने कहा- मां अच्छा खाना लेकर आना। मां घर लौटी तो जिगर का टुकड़ा सीलिंग फैन पर फंदे से लटका मिला।

पिता बोले- बेटा मोबाइल पर गेम्स नहीं खेलता था
पिता ने कहा- सबसे हाथ जोड़कर कहता हूं कि बच्चों को अकेला नहीं छोड़ें। बच्चे टीवी में क्राइम के सीरियल देखकर नया-नया एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि बेटा मोबाइल में गेम नहीं खेलता था। वह सिर्फ ऑनलाइन क्लास के लिए मोबाइल का यूज करता था। रुद्राक्ष पढ़ने में होशियार था। समझ नहीं आ रहा कि उसने ऐसा क्यों किया। उसे कोई परेशानी नहीं थी।

मां को फोन लगाकर कहा- खाने को कुछ अच्छा ले आना
​​​​​​​एकतापुरी कॉलोनी, अशोका गार्डन में रहने वाले अक्षत सिंह फोटोग्राफर हैं। सोमवार सुबह वे काम पर चले गए। पत्नी स्नेहलता, बेटी को लेकर उसके स्कूल चली गईं। घर में उनका बेटा रुद्राक्ष अकेला था। शाम को रुद्राक्ष ने पिता को फोन लगाया। मां के बारे में पूछा। फिर उसने मां को फोन लगाया। बोला- मेरे लिए खाने को कुछ अच्छा लेते आना। मां स्कूल के बाद बाजार कर देर शाम घर पहुंची। देखा तो कमरे के अंदर रुद्राक्ष फंदे पर लटका है। उसे अस्पताल ले गए लेकिन डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया।

पलंग पर टेबल रखकर फंदा लगाया
बच्चे ने सीलिंग फैन से फांसी लगाई। उसने पंखे में फंदा लगाने के लिए पलंग के ऊपर करीब डेढ़ फीट ऊंची टेबल रखी। टेबल पर चढ़कर उसने मां के ही दुपट्‌टे का फंदा पंखे में बनाया और झूल गया।

इस मकान में रहता है रुद्राक्ष का परिवार।
इस मकान में रहता है रुद्राक्ष का परिवार।

एक्सपर्ट बोलीं- स्कूल का चालू होना बहुत जरूरी
मनोचिकित्सक डॉ. रूमा भट्‌टाचार्य के मुताबिक, इस तरह की घटनाएं अक्सर हम सुनते-पढ़ते हैं। छोटे बच्चों में भी मानसिक परेशानियां होती हैं। मूड डिसॉर्डर, अवसाद याद, एनजाइटी डिसॉर्डर से ग्रसित रहते हैं। पेरेंट्स जानकारी के अभाव में लक्षणों को नहीं समझ पाते। स्कूल में भी टीचर नहीं भांप पाते। अभी और ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि स्कूल बंद हैं। स्कूल चालू होना बहुत जरूरी है। स्कूल में बच्चों के सोशल स्किल्स डेवलप होते हैं। इमोशनल हेल्थ ठीक रहती है। नियमित दिनचर्या होती है। हमउम्र बच्चों के साथ खेलना, घुलना-मिलना होता है।

​​​​​​​ये भी पढ़ें:-

बच्चा कार में लॉक, अलर्ट करने वाली खबर:छतरपुर में सालभर के भांजे को कार में छोड़ बाहर आ गया मामा; 15 मिनट फंसा रहा, शीशा तोड़ निकाला

MP में GAY ऐप से सेक्सटॉर्शन का डर्टी गेम:सुनसान जगह बुलाकर रिलेशन बनाते, फिर वीडियो बनाकर ब्लैकमेल करते; गैंग का पर्दाफाश

खबरें और भी हैं...