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जीनोम सीक्वेंसिंग:पहली बार आइसर भोपाल में पीपल-बरगद की जीनोम सीक्वेंसिंग, इन पेड़ों में मौसम के हिसाब से खुद को ढालने की गजब क्षमता

भोपाल2 महीने पहले
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भविष्य में क्लाइमेट चेंज होने की स्थिति में भी इन पौधों को सुरक्षित रखा जा सकेगा, यह स्टडी डेढ़ साल में पूरी हुई - Dainik Bhaskar
भविष्य में क्लाइमेट चेंज होने की स्थिति में भी इन पौधों को सुरक्षित रखा जा सकेगा, यह स्टडी डेढ़ साल में पूरी हुई

भारत का राष्ट्रीय पेड़ बरगद और ढेरों औषधीय गुणों से भरपूर पीपल के पेड़ों की जीनोम सीक्वेंसिंग पहली बार भोपाल में हुई। इस स्टडी को पूरा किया है इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आइसर) भोपाल के बायोलॉजिकल साइंसेज डिपार्टमेंट ने।

यहां के प्रोफेसर डॉ. विनीत शर्मा और युवा वैज्ञानिकों की टीम ने इस स्टडी को डेढ़ साल में पूरा किया। आइसर में हाल ही में हुई पीपल और बरगद की सीक्वेंसिंग पर रिसर्च पेपर सेल प्रेस के अंतरराष्ट्रीय साइंस जनरल आई-साइंस में प्रकाशित हुए।

आइस-एज में कम हो गए थे यह पौधे

स्टडी में यह भी पता चला कि हजारों-हजार सालों तक चलने वाले यह दोनों पौधे कब धरती पर काफी कम हो गए थे। जब पूरी धरती पर बर्फ जमी थी और यह पौधा भी दूसरे फाइकस पौधों की तरह कम हो गए थे। यानी आइस एज के दौरान करीब 0.8 मिलियन साल पहले। इस रिसर्च टीम में डॉ. विनीत शर्मा के साथ श्रुति महाजन, अभिषेक चक्रवर्ती और मनोहर बिष्ट ने काम किया।

इससे यह होगा फायदा

बरगद और पीपल की जीनोम सीक्वेंसिंग का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि भविष्य में क्लाइमेट चेंज होने की परिस्थिति में भी इन पौधों को सुरक्षित रखा जा सकेगा। इन पौधों की ज्यादा लंबे समय तक जीवित रहने का रहस्य पता होने के बाद कम आयु वाले पौधे की लाइफ को बढ़ाने की दिशा में रिसर्च की जा सकती है। बरगद और पीपल से तैयार होने वाली दवाइयों को अब ज्यादा सटीक इलाज देने वाला बनाया जा सकेगा।

हर माहौल में खुद को ढालने का गुण है खास- डॉ. विनीत

डॉ. विनीत बताते हैं कि जीमोन सीक्वेंसिंग से पता चला कि फाइकस प्लांट्स की श्रेणी में आने वाले ये दोनों पेड़ आखिर इतने लंबे समय तक कैसे चलते हैं। इनके जीन्स में ऐसे गुण हैं, जिससे ये ज्यादा बारिश हो, ज्यादा गर्मी या सूखे में भी जीवित रखने खुद को तैयार कर लेते हैं। तुरंत यह अपनी पानी की आवश्यकता को इस तरह घटा लेते हैं कि लंबा समय कम या बिना पानी मिले भी बिता सकें। इसी तरह की सेल्फ सस्टेनेबिलिटी इन पौधों में बीमारियों से लड़ने के लिए भी खुद ही डेवलप हो जाती हैं।