• Hindi News
  • Local
  • Mp
  • Bhopal
  • Forty Years Ago The First Shop Of Worship Material Was Opened In New Market, Today More Than 700 Shops In The Whole City, Turnover Of 25 Crores In A Year

भास्कर खास:चालीस साल पहले न्यू मार्केट में खुली थी पूजन सामग्री की पहली दुकान, आज पूरे शहर में 700 से ज्यादा दुकानें, सालभर में 25 करोड़ का कारोबार

भोपाल19 दिन पहलेलेखक: मनोज जोशी
  • कॉपी लिंक
अमरावती से भोपाल आए पांडुरंग नामदेव ने पिता के निधन के बाद आलू, प्याज की गुमठी को पूजन सामग्री दुकान में बदला - Dainik Bhaskar
अमरावती से भोपाल आए पांडुरंग नामदेव ने पिता के निधन के बाद आलू, प्याज की गुमठी को पूजन सामग्री दुकान में बदला

करीब 40 साल पहले 1980 में न्यू मार्केट में पूजन सामग्री की पहली दुकान खुली थी। उसके पहले तक पूजा से संबंधित हर सामान के लिए किराना, जनरल स्टोर, स्टेशनरी, फोटो फ्रेम और बर्तन आदि की दुकानों पर चक्कर काटना पड़ते थे। आज पूरे शहर में 700 से ज्यादा दुकानें हैं और साल भर मेंं कम से कम 25 करोड़ रुपए का कारोबार होता है।

नौ दुर्गा से लेकर दीपावली तक कम से कम 5 करोड़ रुपए की पूजन सामग्री की बिक्री होती है। न्यू मार्केट में पूजन सामग्री दुकान के संचालक 77 वर्षीय पांडुरंग नामदेव को आप इस मामले में पायोनियर कह सकते हैं। 1960 के दशक में अमरावती से भोपाल आए नामदेव बताते हैं कि उनके पिताजी ने न्यू मार्केट में आलू-प्याज की एक गुमठी शुरू की थी।

पिताजी के निधन के बाद उन्होंने यह गुमठी संभाली और उसे पूजन सामग्री की दुकान में बदल दिया। पांच साल बाद नगर निगम ने गुमठी की जगह दुकान आवंटित कर दी। 77 साल की उम्र में भी वे दुकान पर बैठते हैं। नामदेव कहते हैं कि उन्हें इस बात की संतुष्टि है कि उन्होंने जो राह दिखाई आज शहर में कई लोग उस पर चल रहे हैं। शहर के हर गली- मोहल्ले से लेकर छोटे- बड़े बाजार में पूजन सामग्री की दुकानें खुल गई हैं।

नवरात्रि से- दिवाली तक 5 करोड़ का व्यवसाय

जीएसटी के एक्सपर्ट मुकुल शर्मा बताते हैं कि नौ दुर्गा से दीपावली तक शहर में पूजन सामग्री का कम से कम 5 करोड़ रुपए का व्यवसाय होता है। शेष पूरे साल लगभग 25 करोड़ रुपए की पूजन सामग्री की बिक्री होती है।

गरीब-बेसहारा को- मुफ्त देते हैं अंत्येष्टि का सामान

नामदेव गरीब और बेसहारा लोगों को अंत्येष्टि का सामान मुफ्त उपलब्ध कराते हैं। 2008 तक वे यह काम अपने खर्चे पर करते थे, फिर एक समिति बनाई। नगर निगम से सहायता राशि मिलना शुरू हुई, लेकिन दो साल से वह भी बंद है।

खबरें और भी हैं...