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बिना जुर्म स्टूडेंट को 13 साल जेल, हाईकोर्ट हैरान:यह केस मनगढ़ंत पुलिस जांच की घिनौनी कहानी; जानिए कोर्ट ने क्यों कहा

भोपाल5 महीने पहले
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ये कहानी है MBBS स्टूडेंट चंद्रेश मर्सकोले की। एक दिन पहले मप्र हाईकोर्ट ने चंद्रेश को अपनी ही प्रेमिका श्रुति हिल की हत्या के आरोप से बरी किया है। चंद्रेश ने इस आरोप के लिए पूरे 13 साल जेल में काटे हैं। हाईकोर्ट ने न केवल उन्हें निर्दोष माना, बल्कि पुलिस की लापरवाही पर राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए 42 लाख रु. का मुआवजा चंद्रेश को देने का निर्देश भी दिया है। चंद्रेश गांधी मेडिकल कॉलेज में MBBS फाइनल ईयर के स्टूडेंट थे। पुलिस जांच के आधार पर सेशन कोर्ट ने चंद्रेश को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

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जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सुनीता यादव ने अपने फैसले में कहा, इस केस में पुलिस ने जानबूझकर अपीलकर्ता (चंद्रेश मस्कोले) को झूठा फंसाने के एकमात्र उद्देश्य से काम किया और जो असली अपराधी हो सकते थे, उन्हें ही अभियोजन पक्ष का गवाह बनाकर बचाने का काम किया।

आखिर हुआ क्या था
20 अगस्त 2008 को MBBS स्टूडेंट चंद्रेश के जूनियर डॉ. हेमंत वर्मा ने पुलिस को बताया कि चंद्रेश उनकी कार लेकर गया है और उन्हें कुछ गड़बड़ी की आशंका है। पुलिस ने जांच शुरू की और 23 अगस्त को पचमढ़ी से श्रुति का शव बरामद किया। अगले ही दिन चंद्रेश को गिरफ्तार कर लिया गया। भोपाल कोर्ट ने 31 जुलाई 2009 को चंद्रेश को उम्रकैद की सजा सुनाई। चंद्रेश ने बाद में हाईकोर्ट में अपील की।

डॉ. हेमंत और रिटायर्ड आईजी शैलेंद्र की भूमिका पर संदेह; कोर्ट ने कहा- इनमें घनिष्ठता थी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि यह केस पूरी तरह मौके पर मिले सबूतों पर ही टिका हुआ था। इस हत्याकांड में कोई भी प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। वहीं पुलिस का गवाह रामप्रसाद (डॉ. हेमंत का ड्राइवर) जिसने चंद्रेश को श्रुति की लाश बिस्तर में लपेटकर गाड़ी में रखते और पचमढ़ी की देनवा घाटी में फेंकते हुए देखना बताया था, वह भी अदालत में इस बयान से पलट गया था।

अदालत ने पूरे केस में पाया है कि पुलिस की पूरी कहानी डॉ. हेमंत और उनके ड्राइवर के बयानों पर आधारित है, जिनकी सत्यता की कोई जांच पुलिस ने नहीं की। कोर्ट ने तब भोपाल रेंज के आईजी रहे शैलेंद्र श्रीवास्तव पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि डॉ. हेमंत और शैलेंद्र में घनिष्ठता थी। शैलेंद्र ही अपने प्रभाव का अनाधिकृत इस्तेमाल करते हुए कोहेफिजा थाने के पुलिस स्टाफ को निर्देश देकर जांच की दिशा तय कर रहे थे। (इन दोनों ने ही भास्कर को प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया।)

80 पेज के फैसले में कोर्ट ने उठाए सवाल, गाड़ी में 4 लोग थे, दो कहां गए ?

  • डॉ. हेमंत ने घटना के बाद आईजी शैलेंद्र को सबसे पहले फोन किया। फिर उसने पुलिस को लाश फेंकने का ब्योरा दिया। आईजी के निर्देश पर 20 अगस्त को कोहेफिजा थाना से सीएसपी और टीआई जीएमसी के एक वार्ड में डॉ. वर्मा से मिले। जहां डेड बॉडी मिलने से पहले ही वर्मा ने पुलिस अफसरों को एक लेटर दिया, जिसमें खुद को इनोसेंट बताया।
  • डॉ. हेमंत ने घटना के दिन 19 अगस्त को खुद को किसी काम से इंदौर जाना बताया और अपनी गाड़ी ड्राइवर के साथ डॉ. चंद्रेश को पचमढ़ी जाने के लिए देना बताया था। पुलिस ने जानबूझकर इस बात की कोई तफ्तीश नहीं कि कि डॉ. हेमंत और चंद्रेश के बीच ऐसी कौन सी घनिष्ठता थी।