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रंगोत्सव:हजार से ज्यादा जगहों पर हुआ होलिका दहन आज धुलेंडी पर नहीं निकालेंगे चल समारोह

भोपाल2 महीने पहले
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  • प्रशासन द्वारा छूट मिलने के बाद सांकेतिक रूप से पूजा करने पहुंचे श्रद्धालु

प्रेम और सद्भाव के होली पर्व की पूर्व बेला में फाल्गुन पूर्णिमा पर रविवार रात लॉकडाउन के चलते शहर में एक हजार से अधिक स्थानों पर होलिका दहन हुआ। कई स्थानों पर होलिका दहन के पौराणिक दृश्य की झलक दिखाई दी, जब लोगों ने अग्नि प्रज्जवलित होते ही होलिका को जलने दिया और उनकी गोद से भक्त प्रहलाद की प्रतिमा को उठा लिया।

प्रशासन द्वारा सांकेतिक रूप से होलिका दहन करने की छूट दी गई थी। इस बार युवाओं में होलिका दहन को लेकर खास तैयारियां नहीं की थी। सोमवार को होली है, परंतु शहर में कोई चल समारोह नहीं निकाला जाएगा। प्रशासन ने लोगों से घरों में रहकर ही पर्व मनाने की अपील की है। शहर में रात करीब साढ़े आठ बजे से होलिका दहन का सिलसिला शुरू हुआ, जो देररात तक जारी रहा। लोगों ने होलिका दहन स्थलों पर पहुंचकर अबीर, गुलाल, चढ़ाकर पूजा की।

पकवानों का भोग लगाया
होलिका दहन में गो काष्ठ व कंडों का उपयोग किया। होलिका दहन स्थलों पर पुलिस बल भी दिखाई दिया। होली जलने के बाद लोगों को घरों में भेजना शुरू कर दिया। पूजा में पकवानों का भोग लगाया।

मराठी समाज में कुलदेवी पूजा
मराठी परिवारों में रविवार को पूर्णिमा पर होलिका दहन से पहले कुलदेवी की पूजा की गई। लोगों ने उपवास रखा। पूजा के साथ घर-परिवार की खुशहाली के लिए कुलधर्म से जुड़े ग्रंथों का पाठ किया गया।

वर्ष 1945 में चौक से हुई थी सबसे पहले होलिका दहन की शुरुआत

भोपाल में होलिका दहन की शुरुआत नवाबी रियासत में 1945 में हुई थी। सबसे पहला होलिका दहन पुराने शहर के चौक में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भाईजी पं. उद्धवदास मेहता की अगुवाई में हुआ था।

एक-दूसरे के घर जाकर रंग गुलाल लगाने की परंपरा
हिंदू एकता मंच के संयोजक व वरिष्ठ समाजसेवी 81 वर्षीय पं. ओम मेहता ने बताया कि आजादी के पूर्व शहर में होली का जुलूस नहीं निकलता था। वर्ष 1945 में होलिका दहन की शुरुआत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. उद्धवदास मेहता, छुट्टू महाराज पंडा बाबा और उनके मित्रों द्वारा कराई गई थी।

इसके दूसरे साल जवाहर चौक जनकपुरी में होलिका दहन प्रारंभ किया गया। इसी साल हुरियारों की टोली जुलूस की शक्ल में निकलने लगी। इसके बाद पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा, सत्यनारायण अग्रवाल, मोहन सिंहल इन टोलियों का हिस्सा बनने लगे थे। एक-दूसरे के घरों पर जाकर रंग-गुलाल लगाने की परंपरा थी।

नवाबी रियासत से ही सौहार्द से मनाते रहे हैं होली का पर्व
नगर निगम के पूर्व आयुक्त 92 वर्षीय देवीसरन ने बताया कि भोपाल में होली के त्योहार को नवाबी रियासत के दौर से ही सौहार्द के पर्व के रूप में मनाया जाता रहा है। उस वक्त तत्कालीन नवाब हमीदुल्ला अपने महल में ही होली मिलन कार्यक्रम रखते थे, उसमें उनके यहां कार्यरत हिंदू कर्मचारी व शहर के कुछ चुनिंदा लोगों को ही आमंत्रित किया जाता था।

गुलाल लगाने व इत्र छिड़ककर लोगों का स्वागत होता था। उनके शासनकाल में वरिष्ठ अधिकारी रहे स्व. अवधनारायण बिसारिया के हाथों में इस पूरे आयोजन की कमान रहती थी। तब होली के दिन छुट्टी रखी जाती थी। ज्यादातर टेसू के फूल से रंग बनाते थे।

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