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MP की दो 'आशा' का WHO भी कायल:एक को दिव्यांग होने से पति ने तलाक दिया, दूसरी के जागरूकता आइडिया ने किया कमाल

भोपाल2 महीने पहलेलेखक: विजय सिंह बघेल

मध्यप्रदेश की दो आशा कार्यकर्ताओं के समर्पण और यूनीक आइडिया की दुनिया कायल है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन को भारत में चल रहा आशा कार्यकर्ता प्रोग्राम पसंद आया। इसके बाद देश के हर राज्य से दाे आशा कार्यकर्ताओं को सम्मानित करने का फैसला किया गया। हाल में WHO के महानिदेशक टेड्रोस अदनोम घेब्रेयेसस ने इसकी घोषणा की। इनसे लिए मध्यप्रदेश से भी दो आशा कार्यकर्ताओं को चुना गया है।

दोनों आशा कार्यकर्ताओं ने विपरीत परिस्थितियों में समर्पण, सेवाभाव और यूनीक आइडिया से WHO का दिल जीत लिया। इनमें भोपाल के नलखेड़ा की आशा कार्यकर्ता भगवती यादव और बड़वानी जिले की अर्चना कुशवाह को पुरस्कृत किया जाएगा। ये पुरस्कार वैश्विक स्वास्थ्य को आगे बढ़ाने, क्षेत्रीय स्वास्थ्य मुद्दों के लिए नेतृत्व और प्रतिबद्धता का प्रदर्शन करने के लिए दिए जा रहे हैं। केंद्र सरकार की ओर से इसकी लिस्ट भी जारी कर दी। जिसकी घोषणा गुरुवार को प्रदेश की PIB ने की। जानते हैं दोनों आशा कार्यकर्ताओं की सक्सेस स्टोरी...

दिव्यांग होने से पति ने छोड़ा, फिर पाया मुकाम

भगवती यादव एक हाथ से अपना पूरा काम करती हैं। यही बात WHO को पसंद आई।
भगवती यादव एक हाथ से अपना पूरा काम करती हैं। यही बात WHO को पसंद आई।

बचपन से एक हाथ से दिव्यांग हूं। पति ने इसका गलत फायदा उठाया। वह मुझे पीटता था। एक हाथ न होने का ताना देकर अत्याचार करता। मायके से पैसे लाने को कहता था। बेटा छह साल का था, तब पति ने तलाक दे दिया। इसके बाद मायके आकर रहने लगी। उन पर बोझ नहीं बनना चाहती थी। अलग रहकर सिलाई शुरू की। साल 2006 में गांव में आशा की नियुक्ति हुई। उस समय पैसों की जरूरत थी। बताया गया कि आशा बनने से 150 रुपए रोज मिलेंगे।

मैं आशा कार्यकर्ता नियुक्त हो गई। पहले मंगलवार, शुक्रवार को टीकाकरण कराने जाती थी। बाद में काम बढ़ता गया। डिलीवरी कराने से लेकर गर्भावस्था की जांच कराने और बच्चों का वजन करना। मां की केयर, बच्चे की देखभाल करना, सिखाने और हेल्थ एजुकेशन देने का काम करने लगी। जन्म से लेकर 10 साल तक का बच्चा होने तक मां और परिवार के लगातार संपर्क में रहती हूं। पहले 150 रुपए मिलते थे। अब छह-सात हजार तक मिल जाते हैं। बेटा 22 साल का हो गया है। उसने 12वीं की परीक्षा पास कर ली है।

(जैसा- बड़वानी के राजपुर ब्लॉक के सनगांव की आशा कार्यकर्ता भगवती यादव ने बताया)

नलखेड़ा की आशा कार्यकर्ता के नारे दुनिया में छाए

अर्चना कुशवाह नारे खुद ही गढ़ती थीं। इसके बाद खुद ही दीवारों पर पेंट भी करती थीं।
अर्चना कुशवाह नारे खुद ही गढ़ती थीं। इसके बाद खुद ही दीवारों पर पेंट भी करती थीं।

मैं अर्चना कुशवाह भोपाल के बैरसिया ब्लॉक के नलखेड़ा गांव में आशा कार्यकर्ता हूं। मैं साल 2020 में इस कार्यक्रम से जुड़ी। मैंने कोरोना संकट के दौरान अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाई, इस दौरान लोगों को कोरोना से बचाने के लिए नारे भी खुद ही गढ़े। इसके बाद गांव की दीवार पर उन्हें लिखा भी। वैक्सीनेशन शुरू हुआ तो गांव के बुजुर्ग टीका लगवाने को तैयार नहीं हो रहे थे। मैंने दिवाली के पहले गांव में 60 साल से अधिक उम्र की बुजुर्ग महिलाओं को एक-एक साड़ी और 10-10 दीपक उपहार में दिए। साथ ही वैक्सीनेशन का महत्व बताते हुए उसे लगवाने की अपील भी की। जिससे गांव के लोग टीका लगवाने के लिए तैयार हुए। मेरे काम की तारीफ कलेक्टर से लेकर केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अफसर कर चुके हैं।

(जैसा– अर्चना कुशवाह ने भास्कर को बताया।)