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मुरैना के कछुओं की तस्करी के रूट का खुलासा:तिलकधारी कछुए की मर्सिडीज-ट्रक-ट्रेन से इंटरनेशनल तस्करी; एसटीएफ को 11 विदेशी, 10 देसी तस्करों की तलाश

भोपाल22 दिन पहलेलेखक: रोहित श्रीवास्तव
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4 शहरों के लोग इन कछुओं को निकालने मुरैना आते हैं, उनका वेतन 25 से 30 हजार रु. महीना। 1.50 लाख में बिकता है 200 रु. में मिलने वाला एक तिलकधारी कछुआ। - Dainik Bhaskar
4 शहरों के लोग इन कछुओं को निकालने मुरैना आते हैं, उनका वेतन 25 से 30 हजार रु. महीना। 1.50 लाख में बिकता है 200 रु. में मिलने वाला एक तिलकधारी कछुआ।

थाईलैंड पुलिस ने भारत सरकार से एक कछुआ तस्कर के प्रत्यर्पण की मांग की है। यह तस्कर मुरैना में चंबल नदी में पाए जाने वाले तिलकधारी कछुए की तस्करी करता है। ये शख्स चेन्नई का रहने वाला मनीवन्नन है, जो इन दिनों मप्र की सागर जेल में बंद है। अब बात इस विशेष कछुए के तस्करी रूट की। ये कछुआ नदी से बाहर निकलने के बाद 200 रु. में बिकता है, जिसे विदेशों में डेढ़ लाख रु. में बेचा जाता है।

तस्करों को इनकी पहली डिलीवरी ग्वालियर-आगरा में होती है, जहां से इन्हें शिकोहाबाद, लखनऊ, कानपुर से मर्सिडीज जैसी महंगी कारों, ट्रक या फिर ट्रेन से कोलकाता पहुंचाते हैं। यहां से तस्कर अलग-अलग रास्तों से इन्हें बांग्लादेश, श्रीलंका, हांगकांग, चीन, मलेशिया पहुंचाते हैं। तस्करी के इस रूट का खुलासा एसटीएफ वाइल्ड लाइफ की जांच में हुआ है।

एसटीएफ के मुताबिक इन कछुओं की तस्करी का नोडल सेंटल कोलकाता है। चंबल से कछुए निकालकर उन्हें खरीदने और तस्करों तक डिलीवर करने के लिए 25 से 30 हजार रु. महीने के वेतन पर कई बेरोजगारोें को रखा गया है। ये लोग श्योपुर, मुरैना, ग्वालियर, आगरा से आते हैं और कोलकाता तक कछुए पहुंचाने की जिम्मेदारी इन्हीं की है। शेष | पेज 8 पर

घड़ियाल ईको सेंटर देवरी से चुराए जाते हैं तिलकधारी कछुए

वन अफसरों ने बताया कि मुरैना में चंबल नदी पर देवरी में बने घड़ियाल ईको सेंटर से तिलकधारी कछुओं को अवैध रूप से चुराया जाता था। यह काम सेंटर का मछली ठेकेदार कैलाशी उर्फ चच्चा उर्फ छउआ करता था। कैलाशी जब ईकोसेंटर में घड़ियालों के लिए खाना (मछलियां - फीड्स) डालने जाता था, तभी वह नदी में जाल डालकर ताल तिलकधारी कछुओं को भी पानी में से निकाल लेता था। ईको सेंटर में घड़ियालों के लिए मछली डालने का जिम्मा कैलाशी का होने के कारण उसका यहां बेरोकटोक आना - जाना था। इसके अलावा चंबल नदी से लाल तिलकधारी कछुए को नदी के अलग - अलग किनारों से तस्कर निकालते हैं।

चंबल नदी से 200 रु. में निकालकर 6 देशों में डेढ़ लाख में बेच रहे, कोलकाता इसका नोडल सेंटर

तस्करी का बड़ा कारण- तिलकधारी कछुए से घर में शांति, तरक्की, आर्थिक मजबूती आती है

एसटीएफ के मुताबिक लाल तिलकधारी कछुआ (रेड क्राउन रूफ्ड टर्टल) सिर्फ चंबल नदी में मिलता है। यह विलुप्त प्रजाति है। इसकी तस्करी पेट्स ट्रेडिंग के लिए होती है। चाइनीज मिथक है कि इस कछुए को पालने से घर में शांति, व्यापार में वृद्धि और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। इस कारण चीन, हांगकांग, थाईलैंड, मलेशिया, पाकिस्तान, सिंगापुर , श्रीलंका में लोग इन्हें ज्यादा खरीदते हैं।

बंदरगाहों से चोरी-छिपे तस्करी- मदुरई और कन्याकुमारी से समुद्र का सफर कर श्रीलंका ले जाते हैं तस्कर

एसटीएफ वाइल्डलाइफ के अफसरों ने बताया कि मुरैना में चंबल नदी से अवैध तरीके से पकड़े गए कछुओं को श्रीलंका समुद्र के रास्ते भेजते हैं। इसके लिए कोलकाता में पहुंचे कछुओं को पैक कर, मदुरई और कन्याकुमारी ले जाया जाता है। जहां से इन कछुओं को समुद्र के रास्ते तस्कर श्रीलंका लेकर जाते हैं। यहां से कछुओं की तस्करी बंदरगाह से की जाती है।

अब तक 16 तस्कर गिरफ्तार

कछुआ तस्करी के एक मामले में शामिल छह देशों के 11 विदेशी और 10 भारतीय कछुआ तस्करों की तलाश मध्यप्रदेश की एसटीएफ वाइल्डलाइफ को है। इन सभी के खिलाफ चंबल के तिलकधारी कछुआ तस्करी करने के केस दर्ज हैं। जबकि इस केस में 16 कछुआ तस्करों को एसटीएफ वाइल्ड लाइफ गिरफ्तार कर चुकी है।

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