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भास्कर एक्सक्लूसिव इंटरव्यू:मुंबई से परफॉर्म करने भोपाल आए कबीर कैफे बैंड के मेंबर्स ने कहा- मौजूदा समय में कबीर जैसा बेधड़क बोलना मुश्किल

भोपाल3 महीने पहले
कबीर कैफे बेंड के मेंबर्स।
  • जिफलिफ ड्राइव इन म्यूजिक फेस्टिवल में परफॉर्म करने आया कबीर कैफे बैंड
  • मेंबर्स ने कहा- हम कबीर को गाते नहीं जीवन में भी उतार रहे हैं

कबीर के दोहे जब आधुनिक संगीत की धुनों में सज हवाओं में घुले, तो दिलों के तार झंकृत हो उठे। बातों में गीत, गीतों में बातें, किस्से और कहानियों के बीच जीवन दर्शन की खरी-खरी बातें (मत कर माया को अहंकार...) मन को छू कर निकल गई। यह नजारा था भोपाल में जिफलिफ ड्राइव इन म्यूजिक फेस्ट में कबीर कैफे बैंड की लाइव परफॉर्मेंस का। भोपाल कबीर कैफे बैंड के मेंबर्स ने दैनिक भास्कर से खास बातचीत में बताया कि कबीर आज भी प्रासंगिक हैं।

कबीर कैफे बैंड के सदस्य नीरज आर्या ने कहा, कबीर को समझना आसान है, लेकिन उनके जीवन को अपनाना मुश्किल। हम अपने तरीके से कबीर की बात कर रहे हैं। कबीर ने 15वीं शताब्दी में सभी धर्मों की रूढ़ियों का विरोध भी किया। समय आने पर सभी धर्मों को एकजुट करने की बात भी कही, लेकिन आज ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर लोग एक-दूसरे पर अंगुली ही नहीं उठाते, पर्सनल भी हो जाते हैं, फैक्ट पर बात नहीं करते। इससे विवाद बढ़े हैं। कबीर ने सब पर तंज किए, लेकिन किसी पर निजी तौर पर अंगुली नहीं उठाई।

बैंड का हर सदस्य अलग म्यूजिकल बैकग्राउंड से

मुकुंद रामास्वामी कहते हैं- बैंड के बनने की कहानी भी बड़ी मजेदार है। नीरज आर्या नाम का लड़का मुंबई में कई जगहों पर अकेले ही कबीर के दोहे, भजन गाता था। एक दिन बांद्रा स्टेशन पर मेरी उससे मुलाकात हुई। मैं कर्नाटक शास्त्रीय वायलिन की शिक्षा ले रहा था, उसने मुझे सुना। फिर क्या... दोनों साथ चल पड़े कबीर सुनाने के लिए। कई दिनों तक नीरज गिटार बजाकर गाता। मैं वायलिन पर संगत करता। धीरे-धीरे रमन अय्यर, जो तब तक केवल शौक के तौर पर मैन्डोलिन बजाता था, ड्रम्स पर विरेन सोलंकी और ब्रित्तो केसी बास गिटार बजाने के लिए साथ जुड़ गए।

मुकुंद कहते हैं- हमारे ग्रुप की खासियत ही यही है कि इस ग्रुप का हर सदस्य एक अलग कल्चर और म्यूजिकल बैकग्राउंड से आया है। लीड वोकलिस्ट नीरज आर्या लोकगीत से जुड़े रहे हैं। रमन अय्यर और ड्रमर व परकशन बजाने वाले वीरेन सोलंकी भारतीय शास्त्रीय संगीत से जुड़े थे और उस्ताद जाकिर हुसैन के शिष्य रहे हैं। वो अब ड्रम पर तबले का प्रयोग करते हैं। वहीं केसी बास गिटार व गायन में साथ देते हैं। मैं खुद भी कर्नाटिक क्लासिकल बैकग्राउंड से हूं और ग्रुप में वोकलिस्ट हूं।

टिपाणिया के गीत दिमाग में बैठ गए

नीरज कहते हैं- प्रहलाद टिपाणिया को कबीर वाणी गाते देखा, उनको समझा... उनकी बातें समझीं। यह सब दिमाग में बैठ गया और मैं दीवाना हो गया। मैं और मुकुंद उनके घर गए, उनके साथ रहे, उनको समझा, उनकी हर प्रस्तुति को देखा। आज साढ़े पांच साल में हम कबीर के लगभग 25 दोहे गा चुके हैं।

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