बच्चों की साइंटिफिक कुंडली:भोपाल में क्रिस्प बच्चों का करियर स्कोप फिंगर प्रिंट से बताएगा; 3 हजार में जाने संगीतकार बनेगा या फिर साइंटिस्ट, ओलिंपियन सागर ने शुभारंभ किया

भोपाल4 महीने पहले
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भोपाल में क्रिस्प बच्चों के करियर काउंसलिंग के लिए फिंगर प्रिंट के माध्यम से ब्रेन मेपिंग करेगी। - प्रतीकात्मक फोटो - Dainik Bhaskar
भोपाल में क्रिस्प बच्चों के करियर काउंसलिंग के लिए फिंगर प्रिंट के माध्यम से ब्रेन मेपिंग करेगी। - प्रतीकात्मक फोटो

आज कल माता-पिता को बच्चों के भविष्य को लेकर काफी सवाल रहते हैं। बच्चा इंजीनियरिंग के लिए जाए या फिर विज्ञान लेकर डॉक्टरी की तैयारी करे। संगीतकार बनाएं या फिर उसे किसी स्पोर्ट्स में भेजा जाए। ऐसे ही कई सवालों के कारण माता-पिता के साथ ही बच्चों पर भी इसका खराब असर पड़ता है।

इन सब सवालों का जवाब अब भोपाल में केंद्रीय सेंटर फॉर रिसर्च एंड इंडस्ट्रियल स्टाफ परफॉरमेस (क्रिस्प) की फिंगर प्रिंट की ब्रेन मेपिंग के माध्यम से देगा। मुख्य कार्यपालन अधिकारी मुकेश शर्मा ने बताया कि तकनीकी शिक्षा के तहत काम करने वाले क्रिस्प में बच्चों की स्वाभाविक जन्मजात प्रतिभाओं, क्षमताओं और शक्तियों पहचान महज 30 मिनट में की जाएगी।

उसकी क्षमता के अनुसार संबंधित सेक्टर में करियर बनाने के लिए बच्चे की काउंसलिंग भी की जाएगी। इस पूरे टेस्ट के लिए करीब 3 हजार रुपए खर्च करना होगा। ओलिंपियन विवेक सागर ने शुक्रवार को डरमैटोगलाइफिक्स मल्टिपल इंटेलीजेन्स टेस्ट (DMIT) सॉफ्टवेयर का शुभारंभ किया। क्रिस्प ने उन्हें स्पोर्ट्स प्रमोटिंग ब्रांड एम्बेसडर बनाया गया है।

फिंगर प्रिंट का सीधा संबंध दिमाग से

मैनेजमेंट एंड बिहेवियर साइंस की HOD डॉक्टर संस्मृति मिश्रा ने बताया कि फिंगर प्रिंट का सीधा संबंध दिमाग से होता है। फिंगर प्रिंट को डरमैटोगलाइफिक्स मल्टिपल इंटेलीजेन्स टेस्ट (DMIT) सॉफ्टवेयर ट्रेस किया जाता है। यह संबंधित व्यक्ति की क्षमता का आंकलन करता है। इसके बाद करीब 56 पेज की रिपोर्ट तैयार होती है। इसमें उस से संबंधित सभी तरह की जानकारी इसमें होती हैं।

DMIT सॉफ्टवेयर कैसे काम करता है

डरमैटोग्लाइफिक्स मल्टिपल इंटेलीजेन्स एनालिसिस (DMIT) एक विज्ञान है। इसमें हाथों के फिंगर प्रिंट का अध्ययन किया जाता है। इसका प्रयोग अपराध विज्ञान के लिए किया जाता था। इसके बाद इस अध्ययन का प्रयोग शारीरिक और मानसिक रोग की पहचान करने के लिए किया जाने लगा। इस दौरान ये पाया गया कि फिंगर प्रिंट का संबंध हमारे मस्तिष्क से होता है।

फिंगर प्रिंट तथा मस्तिष्क का विकास भ्रूर्ण अवस्था में माता के गर्भ में ही 10वें से 12वें सप्ताह में हो जाता है। शोध में यह भी पाया गया कि जिस तरह की आकृतियां व्यक्ति के मस्तिष्क के विभिन्न भागों पर है, ठीक उसी प्रकार की एक समान छाप व्यक्ति की ऊंगलियों पर फिगंर प्रिंट के रूप में उपलब्ध है। इसे न्यूरो मैगनेटिक इफेक्ट कहा जाता है। यही व्यक्ति की क्षमता के बारे में बताता है।

क्या किसी भी रिपोर्ट शेयर की जाएगी

संस्मृति ने बताया कि यह पूरी तरह से वन-वन होती है। सिर्फ नाबालिग बच्चों की रिपोर्ट उनके माता-पिता से साजा की जाती है। अन्य मामले में सिर्फ टेस्ट कराने वाले को ही रिपोर्ट बताई जाती है। अगर वह किसी और से भी रिपोर्ट शेयर करना जाता है, तो काउंसलिंग के दौरान उसे भी शामिल किया जाता है।

रिपोर्ट से कैसे क्षमता का पता चलता है

टेस्ट के बाद करीब 55 पेज की रिपोर्ट तैयार होती है। इसमें उसके वर्तमान, पास्ट और भविष्य के कई सवालों के जवाब होते हैं। यह उसकी क्षमता और उसके स्वभाव के रूप में होते हैं। इसी रिपोर्ट के आधार पर काउंसलर उन्हें भविष्य में उनके करियर से जुड़ी संभावनाओं के बारे में जानकारी देते हैं। साथ ही उसकी रुचि भी उस सेक्टर में बनाने का प्रयास किया जाता है।

कितनी देर और कैसे होता है टेस्ट

संस्मृति ने बताया कि यह सिर्फ आधे घंटे का टेस्ट होता है। साफ्टवेयर के माध्यम से फिंगर प्रिंट लिए जाते हैं। इसके बाद उनकी काउंसलिंग का समय तय किया जाता है। यह करीब डेढ़ घंटे की होती है। इस दौरान संबंध की मानसिक क्षमताओं और उसकी रुचि के बारे में बताया जाता है। इसके बाद भी संबंधित फोन पर काउंसलिंग ले सकता है। इसके लिए 2 हजार 950 रुपए खर्च करना होता है।

इसका फायदा क्या होगा

कई बच्चे करिया को लेकर यह तय नहीं कर पाते हैं कि उन्हें क्या करना है। इससे बच्चे की क्षमता के साथ ही उसकी रूचि के बारे में पता लगाया जा सकेगा। इससे उसके सवालों के जवाब के साथ ही उसे करियर में फील्ड चुनने में मदद मिलेगी।

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