एक्मो पर सबसे लंबे इलाज का वर्ल्ड का पहला मामला:धर्मजय को लंग्स सपोर्ट की सबसे एडवांस मशीन पर रखा, 80% लंग्स ठीक हो गए पर ब्रेन हेमरेज से हारे

मध्यप्रदेश13 दिन पहलेलेखक: संदीप राजवाड़े

कोरोना संक्रमण से सबसे लंबे समय तक इलाज कराने वाले रीवा के किसान धर्मजय सिंह दुनिया के पहले ऐसे शख्स से थे, जो सबसे लंबे समय तक एक्मो मशीन (एकस्ट्राकार्पोरियल मेंब्रेन ऑक्सिजनेशन) सपोर्ट पर रहे। वे करीब साढ़े छह महीने तक इस मशीन पर जीवित रहे और ठीक भी हुए। पहले दिन से किसान धर्मजय की अंतिम सांस तक उनके साथ रहे उनके बड़े भाई प्रदीप सिंह ने बताया कि चेन्नई अपोलो हॉस्पिटल के कंसल्टेंट लंदन के डॉक्टर ने उन्हें ये बात बताई थी।

इतने लंबे समय के बाद जब धर्मजय चलने-फिरने भी लगे तो एक्सपर्ट्स हैरान थे। वे हर मंडे एक मीटिंग कर इस केस की स्टडी करने लगे थे। हालांकि बाद में ब्रेन हेमरेज से उनकी मौत हो गई। इसे मशीनी इस्तेमाल का साइड इफेक्ट कहा जा रहा है।

अस्पताल में भर्ती होने से लेकर उनकी मौत तक के दौरान आए लक्षण और ट्रीटमेंट के बारे में उनके भाई प्रदीप और डॉक्टरों से जानिए..

चेन्नई से बातचीत के दौरान किसान धर्मजय के भाई प्रदीप ने भास्कर को बताया- 30 अप्रैल को उन्हें कुछ परेशानी हुई थी। वे खुद रीवा स्थित अपने मित्र डॉ. सीके त्रिपाठी के निजी अस्पताल में भर्ती हो गए। उनका ऑक्सीजन 84 तक आ गया। सीटी स्कैन कराने पर फेफड़े में इंफेक्शन मिला और उन्हें भर्ती कर लिया गया। ये उन्होंने अपने बेटे को बताया और कहा कि दादा (मुझे) को मत बताना, वे परेशान होंगे। इसके बाद भी भतीजे ने मुझे बताया और मैं भी वहां पहुंच गया। उन्होंने बताया कि इनके फेफड़े 80 प्रतिशत डैमेज हो गए हैं। हम सब स्तब्ध रह गए। मैंने डॉक्टर को कहा भी कि आपके दोस्त हैं, आपने इन्हें नहीं समझाया। इन्हें सर्दी-खांसी पहले से थी। इसके बाद वहीं 8 मई तक इलाज चला। उनकी तबीयत बिगड़ने लगी और सांस फूलने लगी।

करीब 100% लंग्स इंफेक्टेड हो गए थे। मुंबई में रिश्तेदारों के जरिए दिल्ली और जबलपुर के अस्पताल में भर्ती करने को लेकर बात हुई। भोपाल में भर्ती कराने की बात भी हुई थी, मैंने मना कर दिया। जबलपुर में डॉ. राजपूत को कलेक्टर ने फोन किया, उन्होंने भाई की पूरी रिपोर्ट देखी। फिर कहा कि इन्हें बेड से हिलाने की जरूरत नहीं है, अगर ये बाथरूम भी गए तो खत्म हो जाएंगे। इन्हें कहीं भी शिफ्ट नहीं कर सकते हैं। इसके बाद हमने और पता लगाया।

जानकारी मिली कि इसका इलाज होता है। हैदराबाद और मुंबई में एक्मो लगाते हैं। एक्मो लगाकर ही इन्हें एयर एंबुलेंस से ले जाना पड़ेगा। इसके बाद अमेरिका में रिश्तेदारों और डॉक्टरों से भी बात की। हैदराबाद में जानकारी जुटाई तो पता चला कि वहां एक महीने की वेटिंग है। वहां के पुलिस कमिश्नर से बात कर वेटिंग कम कराई। इसके बाद सक्सेसफुल रिपोर्ट देखी तो पाया कि देश में सबसे अच्छा और ज्यादा एक्मो सक्सेस चेन्नई के अपोलो अस्पताल का है। फिर पूरा प्लान चेंज हुआ और हमने वहां ले जाने का सोचा।

चेन्नई ले जाने के लिए विशाखापट्टनम के डॉक्टर एयर एंबुलेंस से लाए एक्मो मशीन
बड़े भाई प्रदीप ने बताया चेन्नई ले जाने के दौरान पता चला कि वहां इसकी 71 वेटिंग है। उनके पास 17 एक्मो बेड हैं। इसके बाद लगातार प्रयास करते रहे तो हमारी वेटिंग कम होकर एक नंबर पर आई। एक्मो मशीन के साथ एयर एबुलेंस में शिफ्ट करने वाले डॉ. रमन कुमार विशाखापट्‌टनम के थे। उनसे संपर्क किया गया। इसके बाद चेन्नई ले जाने की तैयारी हुई और वे एक्मो मशीन एयर एंबुलेंस से लेकर आए।

50 यूनिट ब्लड की जरूरत थी, गांव के 250 लोग आ गए
डॉक्टर ने कहा कि धर्मजय को शिफ्ट करने के लिए पहले 50 यूनिट ब्लड चाहिए। ब्लड देने के लिए गांव के 250 लोग आ गए। पहले डॉ. रमन वहां से मॉनिटरिंग कर रहे थे। इसके बाद उनकी टीम पूरे इंस्ट्रूमेंट लेकर निकली, लेकिन मौसम खराब होने से बनारस उतरना पड़ा और सड़क के रास्ते रीवा आए। 18 मई को वहां से एक्मो मशीन के सपोर्ट में चेन्नई में शिफ्टिंग हुई। दो-तीन महीने तक रिकवरी नहीं थी।

पहले दुनिया में 5 महीने तक ही एक्मो सपोर्ट में रहे हैं मरीज, एक महीने ही समय सीमा

चेन्नई अपोलो के डॉक्टरों ने कहा कि भाई का लंग्स ट्रांसप्लांट करना पड़ेगा। धीरे-धीरे एक्मो मशीन के जरिए उनका फेफड़े 20-25% तक रिकवर होते रहे। इसका उपयोग अधिकतम तीन महीने ही किसी मरीज पर किया जा सकता है। फिर इनका फेफड़ा ठीक होने लगा और करीब साढ़े छह महीने बाद एक्मो मशीन से बाहर निकले और ठीक भी हुए। लंदन के डॉक्टर चंद्रशेखर से इस अनूठे केस को लेकर डॉक्टरों की हर मंडे मीटिंग होती थी। उन्होंने धर्मजय के एक्मो से लेकर कहा था कि ये दुनिया के पहले मरीज हैं, जो इतने लंबे समय तक इसके सपोर्ट पर रहे हैं। अब तक विश्व का कोई मरीज इतने समय एक्मो में नहीं रहा है, अधिकतम सिर्फ पांच महीने ही रहा है।

धर्मजय ही ऐसे थे कि वह करीबन साढ़े छह महीने तक रहने के बाद ठीक होकर बाहर हुए। फेफड़ा सपोर्ट करने लगा। 80 प्रतिशत रिकवर हो गया है। वेंटिलेटर निकल चुका था और सिर्फ 4 लीटर ऑक्सीजन ही रोज लग रहा था। इसके बाद सोफे पर बैठने लगे और बातें करने लगे।

कमजोरी जरूर थी। फिर हम प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट हो गए। इस खुशी में हमने पूरे अस्पताल में मिठाई, चॉकलेट व केक बांटा। मेरे भाई का 21 नवंबर नया जन्म था। अस्पताल के डॉक्टर, नर्स व सभी लोग खूब खुश थे। इसके बाद अचानक अभी इस महीने उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। इनका प्रेशर डाउन हुआ और ऑक्सीजन डाउन होने लगा। डॉक्टरों ने भी हाथ खड़े कर दिए और फिर ब्रेन हैमरेज से जान चली गई।

इस मशीन के फायदे भी हैं, तो कुछ नुकसान भी। उसका ही असर था कि उन्हें यह साइड इफेक्ट हो गया। एक महीने तक इस मशीन में रहने वाले मरीज को साइड इफेक्ट नहीं होता है। इसके बाद दिखाई देने लगता है।

धर्मजय गुलाब के फूल और स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए प्रसिद्ध थे। उन्हें राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री द्वारा सम्मानित भी किया जा चुका था।
धर्मजय गुलाब के फूल और स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए प्रसिद्ध थे। उन्हें राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री द्वारा सम्मानित भी किया जा चुका था।

एक्सपर्ट व्यू- पेशेंट के शरीर के ऊपर है एक्मो सपोर्ट, निगेटिव पाइंट ही हैं

रीवा के किसान धर्मजय को मई में एक्मो एयर एंबुलेंस के जरिए चेन्नई के अस्पताल में शिफ्ट करने वाले और एक्मो एक्सपर्ट विशाखापट्‌टनम के डॉ. रमन कुमार ने बताया कि चेन्नई अपोलो में शिफ्ट करने के बाद अब उस पेशेंट का क्या ट्रीटमेंट हुआ, यह नहीं पता। जहां तक मुझे मालूम है, वह एक्मो से हट गए थे। अपने से चल रहे थे। ये जो कोविड से लंग्स डैमेज होते हैं, वह पूरी तरह नॉर्मल जैसा नहीं हो पाता है। आप जैसा व मेरे जैसा नहीं हो पाएगा। थोड़ा वह रिवर्सिबल डैमेज रहता है और जिस पेशेंट में ज्यादा रहता है, उसका लंग्स ट्रांसप्लांट करना पड़ता है। इसके अलावा, जिस पेशेंट को पार्शियली रहता है, उसे अपने आप रिकवर हो जाते हैं।

इसके बाद भी अगर एक्मो से रिकवर हो गया तो अच्छी बात है, लेकिन थोड़ा लंग्स फंक्शन कम्प्रोपाइज ही रहता है। देश में एक्मो सिस्टम में सबसे अधिक दिन तक रहने वाले ये ही मरीज थे, जो साढ़े छह महीने रहे हैं। मशीन को लेकर शरीर कैसे टॉलरेट करता है, यह डिपेंड करता है। कई पेशेंट ऐसा नहीं कर पाते हैं। इसमें अच्छी बात यह रही कि मशीन से इनको ब्लीडिंग नहीं थी। यह प्लस पॉइंट, इस कारण ही ये इतने दिन तक जीवित रहे। इस मशीन के लंबे समय यूज का निगेटिव पॉइंट भी है कि ब्लीडिंग के कारण ब्रेन हेमरेज हो जाते हैं। पेशेंट इसकी वजह से डाउन हो जाते हैं।

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