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वजूद की लड़ाई:43 साल की राजनीतिक विरासत वाले शेजवार के साथ उपचुनाव में नौ पुराने नेताओं के भविष्य का भी होगा फैसला, पार्टी को भितरघात का डर

भोपालएक महीने पहले
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प्रतीकात्मक फोटो
  • राव देशराज सिंह यादव, सेंधव और जोशी परिवार के साथ कुछ पूर्व मंत्री भी शामिल

सरकार बनाने-बचाने के साथ ये उपचुनाव कई बड़े नेताओं व उनके परिवारों के राजनीतिक भविष्य का भी फैसला करेंगे। इसमें 43 साल की राजनीतिक विरासत रखने वाले व सात बार के विधायक रहे डॉ. गौरीशंकर शेजवार हैं तो स्व. राव देशराज सिंह यादव, सेंधव और जोशी परिवार के साथ कुछ पूर्व मंत्री भी शामिल हैं। 10 नवंबर को चुनाव नतीजाें के साथ तय हो जाएगा कि भाजपा में इनका साथ और कितना रहने वाला है।

यही कारण हैं कि जिन सीटों पर इन परिवारों का दखल है, वहां पार्टी के बार-बार समझाने के बाद भी भितरघात की स्थिति बन रही है। चुनाव प्रचार के दौरान ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से मुलाकात के बाद पूर्व मंत्री दीपक जोशी ने उनसे माफी मांगी। बावजूद इसके हाटपिपल्या सीट पर भाजपाई असंतुष्ट बने हुए हैं। इसी सीट पर पूर्व विधायक तेजसिंह सेंधव ने प्रेस कांफ्रेंस कर निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान किया था। बाद में भाजपा ने उन्हें साध लिया।

मुंगावली में राव देशराज सिंह यादव, अनूपपुर में रामलाल रौतेल, ग्वालियर में पूर्व मंत्री जयभान सिंह पवैया, मुरैना में पूर्व मंत्री रुस्तम सिंह और गोहद में पूर्व मंत्री लालसिंह आर्य की 15 से 20 साल पुरानी राजनीतिक विरासत दांव पर है। पवैया, आर्य और रुस्तम को भी पार्टी मनाने का दावा कर रही है। कांग्रेस के चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी का भी भिंड और मेहगांव सीट पर प्रभाव रहा। इनकी राजनीति भी उपचुनाव पर टिकी है।

छूटती विरासत... पवैया, रुस्तम और लालसिंह जैसे नेताओं की सीट पर अब कांग्रेस से आए प्रत्याशी
डॉ. गौरीशंकर शेजवार

1977 में पहली बार जनता पार्टी से विधायक बने और तब से सांची में सक्रिय हैं। छह बार भाजपा से विधायक रह चुके। 2018 में बेटे मुदित को टिकट मिला, लेकिन वे हार गए। अब कांग्रेस से भाजपा में आए प्रभुराम चौधरी चुनाव लड़ रहे हैं।

जोशी-सेंधव परिवार
पूर्व सीएम कैलाश जोशी के पुत्र दीपक जोशी 2008 व 2013 में हाटपिपल्या से विधायक रहे। हाटपिपल्या से तेजसिंह सेंधव भी 1990 व 1998 में विधायक रहे। अब कांग्रेस से भाजपा में आए मनोज चौधरी चुनाव लड़ रहे हैं।

रामलाल रौतेल
1998 में हारे, 2003 और 2013 में जीते। लंबे समय से अनूपपुर में सक्रिय हैं। अब कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए बिसाहूलाल सिंह मैदान में हैं। इनकी करीब 25 साल पुरानी सियासी जमीन नतीजों पर निर्भर है।

जयभान सिंह पवैया
ग्वालियर से सांसद रह चुके पवैया ग्वालियर विधानसभा सीट से विधायक भी रहे। 2008 में हारे, 2013 में जीते और 2018 में फिर हारे। अब कांग्रेस से आए प्रद्युम्न सिंह भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं।

रुस्तम सिंह
मुरैना से 2003-2013 में जीते और 2008 व 2018 में हारे। प्रदेश में मंत्री भी रह चुके हैं। उनकी नाराजगी की भी खबरें थीं। लंबे समय से सक्रिय हैं। अब रघुराज सिंह कंसाना मैदान में हैं। ये कांग्रेस से भाजपा में आए हैं।

लालसिंह आर्य
गोहद से 2003 में विधायक चुने गए। अगले चुनाव में हार गए और फिर 2013 में जीतकर मंत्री बने। 2018 में पराजित हो गए। अब यहां से रणवीर जाटव भाजपा के टिकट पर लड़ रहे हैं।

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