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  • Now We Indians Too... In Pakistan We Used To Taunt People By Calling Them Kafirs... Did Not Even Let Them Play Holi.

नागरिकता मिली तो छलका दर्द:अब हम भी भारतीय... पाकिस्तान में हम लोगों को काफिर कहकर ताना मारते थे... होली तक नहीं खेलने देते थे

भोपाल16 दिन पहले
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नंदलाल पंजवानी (81), 30 साल पहले आए थे - Dainik Bhaskar
नंदलाल पंजवानी (81), 30 साल पहले आए थे
  • 158 शरणार्थी भोपाल आए थे, 130 को अब तक मिल चुकी है नागरिकता
  • 28 मामले अभी भी पेंडिग पड़े हैं...
  • बरसों पहले शरणार्थियों के तौर पर पाकिस्तान से भोपाल आए दो लोगों को मिली भारत की नागरिकता

बरसों पहले शरणार्थियों के तौर पर पाकिस्तान से भोपाल आए दो लोगों को आखिरकार भारत की नागरिकता मिल गई। ये लोग पाकिस्तान में धार्मिक आधार पर पीड़ित रहे हैं। किसी ने 3 साल तो किसी ने 2 साल पहले नागरिकता के लिए आवेदन किया था।

बुधवार को गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने भोपाल में रहने वाले नंदलाल व अमित कुमार और मंदसौर के 4 लोगों को नागरिकता के प्रमाणपत्र दिए। नागरिकता मिलने के बाद अमित और नंदलाल बहुत खुश हैं, क्योंकि अब वे यहां के नागरिक हाे गए हैं। पाकिस्तान में भेदभाव और धार्मिक आजादी न होने की यादें वे आज भी भुला नहीं सके हैं। सिंधु एजुकेशन वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष दुर्गेश केसवानी ने कहा कि जिन शरणार्थियों के लिए अब तक नागरिकता नहीं मिली है उनके लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं।

जहां हम लोग रहते थे, वहां कई मंदिर जला दिए गए थे

अमित कुमार- 17 जून 2005 को आए थे भोपाल
अमित कुमार- 17 जून 2005 को आए थे भोपाल

पाकिस्तान के जकोबाबाद में दिसंबर 1987 में मेरा जन्म हुआ था। मैं 17 जून 2005 को हिंदू शरणार्थी के रूप में परिवार के साथ अटारी से होता हुआ भोपाल आया था। यहां उनके मामा रहते थे। कुछ समय उनके यहां रहने के बाद सिंधी कॉलोनी में मकान किराए पर लिया था। पाकिस्तान में हम लोग जिस जगह पर रहते थे, वहां का माहौल हिंदुओं के लिए ठीक नहीं था। कई मामलों में वहां के लोगों द्वारा परिवार को परेशान किया जाता था। बहुत भेदभाव हाेता था और हमारे क्षेत्र में हिंदुओं के कई मंदिर जला दिए गए थे। कट्‌टरता के हालात यह थे कि जब किसी को पता चलता था कि वे हिंदू हैं तो उनसे जातीय फर्क किया जाता था। वहां हिंदुओं को कमतर आंका जाता है और उन्हें हीन दृष्टि से देखा जाता था। वहां के लोग हिंदुओं को कुछ समझते ही नहीं थे। डर लगता था कि कोई अनहोनी न हो जाए। जब भारत आए, तब सुकून मिला। मैंने नागरिकता के लिए 2 साल पहले आवेदन किया था। अब लखेरापुरा में एक कपड़े की दुकान पर काम करता हूं। पिता भी जॉब करते हैं। जब यहां आए थे, तब हिंदी समझने में थोड़ी समस्या आती थी। भोपाल में रहते हुए 15 साल से ज्यादा हो गए। अब किसी तरह की समस्या नहीं है।

जबरन धर्म परिवर्तन करवाने की कोशिश की जाती थी

हम लोग पाकिस्तान के सखर सिंध से करीब 30 साल पहले यहां आए थे, लेकिन नागरिकता का प्रमाणपत्र अब जाकर मिला है। मैं बैरागढ़ में रहता हूं। पाकिस्तान की बात करें तो वहां धार्मिक आधार पर बहुत ज्यादा भेदभाव होता था। हिंदुओं को हीनभावना और नफरत से देखा जाता था। खासकर जमाती धर्म परिवर्तन करवाने की कोशिश में रहते थे। कई हिंदू लड़कियों को उठा कर ले जाते थे और जबरिया इस्लाम कबूल करवाते थे। ऐसे बहुत से केस हुए। मंदिरों को तोड़कर मदरसा बना दिया जाता था। यही नहीं, बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा की व्यवस्था नहीं थी। कई बार काफिर कहा गया। कहते थे कि ये बनिए की दुकान है, यहां से सामान नहीं लेंगे। स्थिति यह थी कि जो भी त्योहार मनाने हों, बहुत ही शांति से घर या अपने क्षेत्र में ही मनाओ। बाहर होली नहीं खेल सकते थे। नंदलाल के बेटे राजेश पंजवानी का जन्म भी पाकिस्तान में हुआ। वे कहते हैं कि वहां धार्मिक आजादी बिल्कुल नहीं थी। हिंदुओं के धर्म परिवर्तन करवाने की कोशिश भी होती थी। स्थिति यह थी कि अगर कोई हिंदू होटल खोल ले तो कहा जाता था कि काफिर के यहां खाना नहीं खाएंगे। राजेश जब यहां आए थे, तब उनकी उम्र 12 साल थी। अब परिवार का कपड़े का व्यवसाय है। उन्हें अब तक नागरिकता नहीं मिली है।

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