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पंचतत्व में विलीन हुए डॉ. एनपी मिश्रा:गैस त्रासदी में मरीजों के इलाज के लिए खुद संभाला था मोर्चा, आखिरी शाम तक ओपीडी चलाई; डॉक्टर्स बोले- सर से हार्डवर्क और डेडिकेशन सीखा

भोपाल3 महीने पहले
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डॉ. एनपी मिश्रा। - Dainik Bhaskar
डॉ. एनपी मिश्रा।

मध्य प्रदेश में चिकित्सा जगत में पितामह से पहचाने जाने वाले डॉ. एनपी मिश्रा का रविवार सुबह निधन हो गया। भदभदा विश्राम घाट पर शाम 4 बजे उनका अंतिम संस्कार किया गया। 90 वर्षीय डॉ. एनपी मिश्रा ने निधन से एक दिन पहले शनिवार रात 9 बजे तक घर पर स्थित क्लीनिक में मरीजों को देखा था। उन्होंने कई डॉक्टरों को सिखाया। भोपाल गैस त्रासदी में डॉ. मिश्रा ने हमीदिया अस्पताल में मरीजों के लिए इलाज के लिए खुद मोर्चा संभाल लिया था। शहर के ख्यातनाम डॉक्टरों ने बताया कि उन्होंने मिश्रा से हार्डवर्क और डेडिकेशन सीखा है।

गैस कांड वाली रात खुद माइग्रेन के दर्द से जूझते रहे, लेकिन उफ्फ तक नहीं की
यूनाइटेड डॉक्टर फेडरेशन के महासचिव डॉ. ललित श्रीवास्तव ने बताया कि भोपाल गैस कांड की रात उन्होंने हॉस्टल के सभी लड़कों को अस्पताल में बुलवाकर ड्यूटी पर लगा दिया। उनके कमरे में जितनी दवाएं थी, सब बांट दीं। इस दौरान सेना के दो ट्रकों में करीब 50 सैनिकों को बेहोशी की हालत में लाया गया। वे उनके इलाज के लिए सक्रिय हो गए। हर मरीज को अस्पताल में भर्ती करने का फरमान सुना दिया। करीब 3 घंटे बाद तो लाशें मिलने की सूचना आने लगी। इस दौरान वे खुद माइग्रेन के दर्द से जूझ रहे थे, लेकिन उफ्फ तक नहीं की।

डॉ. श्रीवास्तव ने बताया, ‘80 के दशक में उनकी ख्याति काफी बढ़ चुकी थी। इसका उदाहरण ये है कि ग्वालियर में वर्ष 1983 में वे चिकित्सीय समारोह में पहुंचे तो ऑडिटोरियम में पैर रखने तक की जगह नहीं थी। कारण इतना था कि लोग एनपी मिश्रा को देखना चाहते थे, जबकि वे खुद ग्वालियर के थे। उनके चले जाने का जो दुख मुझे हुआ है, उसका मैं वर्णन नहीं कर सकता। आंखें नम हैं। उन्हें मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।’

डॉ. श्रीवास्तव ने बताया, ‘इस उम्र में भी डॉ. मिश्रा नए-नए अनुसंधान के चलते खुद को अपडेट रखते थे। डॉक्टरों की हर कॉन्फ्रेंस में उन्हें लेक्चर के लिए बुलाया जाता, तो वे मना नहीं करते। वे चलते-फिरते यूनिवर्सिटी थे। उम्र के आखिरी पड़ाव में भी सक्रिय थे। मैं जानकर हैरान हूं कि कल रात को भी उन्होंने मरीजों को देखा। एक नर्सिंग होम में भी किसी पेशेंट को देखने गए। वे हमारे डीन रहे। अनुशासन प्रिय थे। वे जीएमसी के ऐसे प्रोफेसर थे, जो सप्ताह में 3 दिन क्लास लेते थे। ऐसा अन्य प्रोफेसर नहीं करते थे। उनकी क्लास शुरू होने का टाइम था, लेकिन खत्म होने का नहीं।’

चिरायु अस्पताल के सीएमडी डॉ. अजय गोयनका ने कहा- मैंने अपने करियर की शुरुआत उनके मार्गदर्शन में की। दो साल उनका असिस्टेंट बनकर काम सीखा। सर से ही हार्ड वर्क सीखा।

एमपी नेशनल हेल्थ मिशन के डायरेक्टर डॉ. पंकज शुक्ला ने कहा- हम जब एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे थे। तब डॉ. मिश्रा रोजाना अस्पताल में शाम को राउंड लेने आते थे। इसके साथ ही वह छात्रों की पढ़ाई शुरू कर देते थे। उनका पढ़ाया गया अक्षरश: याद हो जाता था। मेरे भोपाल सीएमएचओ बनने पर उनसे बात होती थी। वह सलाह भी देते थे।

डॉ. मिश्रा की असिस्टेंट डॉ. मेघा सोनी ने कहा- इस उम्र में भी डॉक्टर मिश्रा खुद ही मरीज का ब्लड प्रेशर और एग्जामिन करने का काम करते थे। वह हमेशा कहते थे कि उम्र सिर्फ नंबर हैं। जीवन को आनंद के साथ जीओ। उनसे हार्ड वर्क और डेडिकेशन सीखने को मिला। वह वीवीआईपी और आम सभी मरीजों को एक समाज समय देते थे।

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