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MP में सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अनदेखी:उम्रकैद काट रहे 400 दुष्कर्मी पैरोल पर छूटेंगे, इनमें 100 कैदी तो मासूम बच्चियों के दोषी

भोपाल2 महीने पहलेलेखक: सुनीत सक्सेना
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सरकार के फैसले से पीड़ित परिवार नाराज हैं। - Dainik Bhaskar
सरकार के फैसले से पीड़ित परिवार नाराज हैं।

प्रदेश की जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे दुष्कर्मियों को कोरोना महामारी में पैरोल पर रिहा करने की तैयारी है। 5 जून को जेल मुख्यालय ने सभी जेल अधीक्षकों को इस संबंध में पत्र लिखा है। भोपाल की सेंट्रल जेल में ऐसे 400 बंदी हैं, जिसमें 100 बंदी ऐसे हैं जो नाबालिग बच्चियों से ज्यादती के मामले में सजा काट रहे हैं।

हालांकि, इन बंदियों को भी पैरोल का अधिकार है, लेकिन जेल मुख्यालय का यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के 2015 के उस फैसले के खिलाफ है, जिसमें कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि ऐसे बंदी जिन्होंने दुष्कर्म का अपराध किया है और जिन्हें राष्ट्रीय जांच एजेंसियों के मामले में सजा हुई है, उन्हें रिहा नहीं किया जा सकता। इनके अलावा जो भी बंदी हैं, उन्हें राज्यपाल धारा 161 के तहत सजा से राहत दे सकते हैं। फिलहाल सरकार के फैसले से पीड़ित परिवार नाराज हैं।

उनका कहना है कि पैरोल अवधि की गणना सजा में नहीं होना चाहिए। पैरोल पर छोड़ने से पहले जेल प्रबंधन को पीड़ित परिवार का भी पक्ष जानना चाहिए। हालांकि डीआईजी जेल मुख्यालय संजय पांडे का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ही बंदियों को पहले 60 दिन और बाद में 30 दिन की पैरोल स्वीकृत है। दुष्कर्म मामलों में आजीवन कारावास की सजा काट रहे बंदियों की पैरोल पर रोक नहीं है, उन्हें पहले भी पैरोल दी जाती रही है। प्रत्येक मामले में मेरिट के आधार पर पैरोल तय होती है।

पीड़ितों का दर्द : उन दरिंदों को छोड़ना, मतलब हमें जीते जी मारने जैसा

31 अक्टूबर 2017 को हबीबगंज रेलवे ट्रैक पर छात्रा से गैंगरेप करने वालों को कोर्ट ने उम्रकैद दी। अब ये बंदी भी पैरोल पर बाहर आएंगे। पीड़ित छात्रा के पिता कहते हैं- उस दिन को याद करके रूह कांप जाती है। बेटी को आज भी घर से बाहर निकलने में डर लगता है। आरोपियों को पैरोल पर छोड़ना हमें जीते जी मारने जैसा है। पुलिस इन दरिंदों को पहले ही बड़ी मुश्किल से पकड़ सकी थी, उन्हें पैरोल पर छोड़ना गलत है।

04 जुलाई 2013 एमपी नगर जोन वन स्थित एक होटल के पास गोल्डी बग्गा की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। सभी आरोपियों ने अपने-अपने जिलों की जेल में ट्रांसफर ले लिया था। सभी आरोपी पैरोल पर रिहा हैं। गोल्डी के छोटे भाई सतवंत सिंह बग्गा कहते हैं कि ऐसा करने से पहले सरकार हमारा पक्ष क्यों नहीं लेती। पैरोल पर बंदियों को छोड़ा जाता है और हमें लगता है कि गुनहगार हम हैं।

थोड़ा-थोड़ा बढ़ाकर अब तक 390 दिन की पैरोल

जेल में कोरोना संक्रमण फैलने से रोकने के लिए पहली लहर में बंदियों को पैरोल और विचाराधीन कैदियों को अंतरिम जमानत देकर छोड़ा गया था। तब पैरोल की अवधि समय-समय पर 300 दिन तक बढ़ाई गई। भोपाल सेंट्रल जेल में बंद करीब 100 बंदी ऐसे हैं, जिनकी अब तक 300 दिन की अवधि पूरी नहीं हुई है और उन्हें 60 दिन की पैरोल और दे दी गई। अब जब कोरोना की दूसरी लहर पूरी तरह काबू में है, तब राज्य सरकार ने बंदियों की पैरोल अवधि 30 दिन और बढ़ा दी है। जेल मुख्यालय से इसके आदेश 14 जून को जारी हुए।

बड़ा सवाल : जब दूसरी लहर काबू में है तो पैरोल देने की जरूरत क्या?

जेल सूत्रों के मुताबिक नियमानुसार उन सभी बंदियों को पैरोल की पात्रता है, जो दो साल की सजा काट चुके हैं। कोरोना काल में राज्य सरकार ने बंदियों की टुकड़ों-टुकड़ों में पैरोल अवधि बढ़ाई है। अब जब कोरोना की दूसरी लहर पर काबू पा लिया गया है, ऐसे में पैरोल अवधि बढ़ाना और ज्यादती के मामलों में उम्रकैद काट रहे बंदियों को पैरोल पर रिहा करने का फैसला क्यों लिया गया?

बंदियों की जेल वापस न आने की भी संभावनाएं ज्यादा

नाम न छापने की शर्त पर एक जेल अफसर ने कहा कि सरकारें ऐसे बंदियों को सजा माफी का लाभ देकर रिहा नहीं कर सकतीं। इन बंदियों की तो लाश ही जेल से बाहर जाती है। ऐसी स्थिति में इन्हें पैरोल देना ठीक नहीं है। उनके जेल वापस लौटने की संभावनाएं कम रहती हैं।