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शुभ संक्रांति:राम ने अयोध्या में उड़ाई थी पतंग, मोक्ष पाने भीष्म पितामह ने इसी दिन त्यागे थे प्राण; देवता भी प्रयागराज में करते हैं त्रिवेणी स्नान

भोपाल4 महीने पहलेलेखक: राजेश चंचल
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मकर संक्राति 15 जनवरी को मनाई जाएगी। इस बार सूर्य का मकर राशि में प्रवेश एक दिन पूर्व 14 को शुक्रवार रात 8.58 बजे होगा। सूर्य आराधना के इस बड़े पर्व से पांच पौराणिक प्रसंग भी जुड़े है, जिनका उल्लेख धर्मग्रंथों में भी मिलता है। किसी ग्रंथ में मोक्ष पाने के लिए भीष्म पितामह का इसी दिन प्राण त्यागने का उल्लेख है तो कहीं मकर संक्रांति पर ही भगवान राम द्वारा पतंग उड़ाने और राजा भागीरथ द्वारा पूर्वजों को गंगा में तिल से तर्पण करने की बात कही गई है।

1.इसी दिन से होती है देवताओं के दिन-रात की गणना

पंडितों के अनुसार सूर्य पूजा मकर संक्रांति का सबसे बड़ा पर्व है। इसकी वजह सूर्य का इस दिन उत्तरायण होना है। सूर्य 6 महीने दक्षिणायन और 6 माह उत्तरायण रहते हैं। शास्त्रोक्त मान्यता है कि देवताओं के दिवसों की गणना इस दिन से ही प्रारम्भ होती है। सूर्य जब दक्षिणायन में रहते है तो उस अवधि को देवताओं की रात्रि व उत्तरायण के 6 माह को दिन कहा जाता है।

2.संक्रांति पर तीर्थराज प्रयाग में स्नान का विशेष महत्व

तुलसी मानस प्रतिष्ठान के विद्वान देवेंद्र रावत के अनुसार रामचरित मानस के बालकांड में चौपाई है - माघ मकर गत रवि जब होई, तीरथ पतिहि आव सब कोई…देव दनुज किन्नर नर श्रेनी, सादर मज्जहि सकल त्रिवेणी…अर्थात माघ माह में जब सूर्य मकर राशि में जाते हैं, तब देवता ही नहीं, मनुष्य, दैत्य और किन्नर भी तीर्थराज प्रयाग में त्रिवेणी में स्नान करते हैं।

3.भगवान ने इसी दिन उड़ाई पतंग और पहुंची इंद्रलोक

मानस की चौपाई में उल्लेख है कि संक्रांति पर भगवान राम ने पतंग उड़ाई थी। चौपाई है राम इक दिन चंग उड़ाई, इंद्रलोक में पहुंची जाई, और.. जासु चंग अस सुंदरताई, सो पुरुष जग में अधिकाई…यानी अयोध्या से श्रीराम की पतंग उड़कर इंद्रलोक जा पहुंची। संस्कृत विद्वान एलएन पांडे के अनुसार क्षेपक में चंग शब्द का उपयोग पतंग के लिए किया गया है।

4.संक्रांति के इंतजार में भीष्म 14 दिन रहे बाण शैय्या पर

महाभारतकाल में जब युद्ध में भीष्म पितामह बुरी तरह घायल हो गए थे और बाणों की शैय्या पर लेटे थे, तब उन्होंने प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार किया था। वह मकर संक्रांति का दिन ही था, जब उन्होंने अपने प्राण त्यागे। उनका मानना था कि इस दिन मृत्यु का वरण करने से उन्हें मोक्ष मिलेगा। यह बात श्रीकृष्ण ने भी उनसे कही थी।

5.भागीरथ ने तिल से किया था अपने पूर्वजों का तर्पण

राजा भागीरथ सूर्यवंशी थे, जिन्होंने तप साधना के परिणाम स्वरूप पापनाशिनी गंगा नदी का पृथ्वी पर अवतरण कराया था। इसके बाद उसकी मदद से अपने पूर्वजों को मोक्ष दिलवाया था। राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजों का श्राद्ध तर्पण गंगाजल, अक्षत, और तिल के द्वारा किया था। तब से माघ मकर संक्रांति में स्नान और श्राद्ध तर्पण की प्रथा आज तक प्रचलित है।

तिल के 6 उपयोग

विष्णु धर्म सूत्र: तिल के छः उपयोग से पुण्य मिलता है- तिल जल से स्नान, तिल का दान, तिल से बना भोजन, जल में तिल अर्पण, तिल से आहुति, तिल का उबटन लगाना शमिल है।

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