पीडब्ल्यूडी की विद्युत शाखा का कमाल:नियम ई-टेंडर का, लेकिन इसके बिना ही जारी हो रहे लाखों रुपए के वर्कआॅर्डर

भोपाल3 महीने पहले
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यह पैसा राजधानी की सरकारी काॅलोनियों का है, इससे विद्युत यांत्रिकी डिवीजन एक में होते हैं मरम्मत के छोटे-मोटे काम। - Dainik Bhaskar
यह पैसा राजधानी की सरकारी काॅलोनियों का है, इससे विद्युत यांत्रिकी डिवीजन एक में होते हैं मरम्मत के छोटे-मोटे काम।

पीडब्ल्यूडी में छोटा से छोटा काम कराने के लिए ई-टेंडर की व्यवस्था है, लेकिन राजधानी क्षेत्र के ईएंडएम (विद्युत यांत्रिकी) डिवीजन एक में इसके बिना ही लाखों रुपए के वर्क ऑर्डर जारी हो रहे हैं। इसे ‘सब वर्क ऑर्डर’ कहा जा रहा है। यह पूरा पैसा जोनल पार्ट का है।

दरअसल पीडब्ल्यूडी में जोन के हिसाब से मेंटेनेंस की राशि रखने का प्रावधान है। एक जोन में सालभर के लिए 25 लाख रुपए तक के टेंडर किए जाते हैं। इसके बाद यदि 3-4 लाख रुपए से लेकर बड़ी राशि के काम होना है तो इसका वर्क ऑर्डर बिना टेंडर ही जारी किया जा रहा है।

ताजा मामला मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के काम का है। इसका प्रस्ताव 47 लाख 66 हजार 500 रुपए का बनाया गया और सीधे वर्क ऑर्डर जारी हो गए। यह पैसा जोनल वर्क का था। बाद में बीस लाख के टेंडर जारी करके गलती सुधारने की कोशिश की गई।

विभाग के सूत्रों का कहना है कि जोनल पार्ट ऑर्डर की इस व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए मार्च 2021 में दिशा-निर्देश बनाए, लेकिन यह लागू ही नहीं हो सके। इसमें स्पष्ट किया गया था कि 2 लाख रुपए से अधिक के कामों के लिए अलग से टेंडर किए जाएं। इसकी भी अनुमति मुख्य अभियंता से ली जाए।

इन कामों के लिए सीधे वर्कऑर्डर हुआ जारी

  • 47.66 लाख : प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की केंद्रीय प्रयोगशाला में हैजार्डस् वेस्ट एनालिसिस लैब के रेनोवेशन का काम होना था। सीधे वर्क आॅर्डर दिया गया।
  • 66.73 लाख : अकादमी परिसर में स्ट्रीट लाइट, हाईमास्क, विद्युत पैनल (सब स्टेशन), ट्रांसफार्मर जनरेटर मशीनों के काम के आर्डर जारी हुए।
  • 19.95 लाख : ईदगाह हिल्स स्थित प्रशासकीय भवन के काम इसी व्यवस्था के तहत किए जा रहे हैं।
  • 4.97 लाख और 4.53 लाख : बी और डी टाइप अलग-अलग दो बंगलों में इलेक्ट्रिफिकेशन से जुड़े कामों के लिए सीधे वर्क आर्डर जारी हुआ।
  • 3.65 लाख का काम पशुपालन निदेशालय में और 4.50 लाख रुपए के काम राजभवन में वर्कऑर्डर जारी करके किए गए।

ऐसा है जोनल पार्ट- एक-पूरा गैस राहत क्षेत्र, दूसरा-श्यामला हिल्स, राजभवन, 45 व 74 बंगले, प्रोफेसर कॉलोनी, पीएचक्यू, तीसरा-एम (वन) में शिवाजी नगर, तुलसी नगर, छह नंबर, 1250 और पोल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के आसपास का इलाका। चौथा-चार ईमली (कर्मशाला) में 1100 क्वार्टर से लेकर कोटरा तक का इलाका।

पहले पांच करोड़ तक का दायरा था

तीन साल पहले पांच करोड़ रुपए तक जोनल पार्ट में होते थे। इसे घटाकर 25 लाख कर दिया गया। तब जिस ठेकेदार को साल भर के लिए जोनल पार्ट मिलता था, वह अपना कॉल सेंटर बनाकर रखता था। शासकीय भवनों में रहने वाले इसी कॉल सेंटर पर अपनी शिकायत दर्ज कराते थे।

शासकीय दफ्तरों के काम यदि हुए हैं तो इसका परीक्षण कराएंगे

यदि शासकीय दफ्तरों के बड़े काम सीधे वर्क आर्डर से हुए हैं तो उसकी जानकारी कराएंगे। वैसे भी प्रक्रिया के तहत जोनल पार्ट के ई-टेंडर ही होते हैं। इसी से मेंटीनेंस के छोटे काम किए जाते हैं। यदि छोटे कामों के भी टेंडर किए जाएंगे तो समय पर लोगों के काम नहीं हो पाएंगे। मुख्य अभियंता संजय मस्के का कहना है कि यदि 47 लाख का काम है और वह सीधे दिया गया है तो इसे दिखवाते हैं।
अखिलेश अग्रवाल, ईएनसी, पीडब्ल्यूडी

सीई की मंजूरी से काम करते हैं
जो भी सब वर्क आर्डर होता है वह सीई की मंजूरी से किया जाता है। सब प्रक्रिया के तहत किया जा रहा है।
राजेश दुबे, ईई, ईएंडएम डिवीजन एक

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