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भास्कर एक्सक्लूसिव:सीरियल किलर मनीराम की कहानी बड़े बेटे की जुबानी... पिता की दरिंदगी की वजह से छोड़ा भोपाल, भीख मांगकर करना पड़ रहा गुजारा

भोपाल3 महीने पहलेलेखक: सुमित पांडेय
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भोपाल का दुर्दांत अपराधी मनीराम सेन अब पुलिस की गिरफ्त में हैं। - Dainik Bhaskar
भोपाल का दुर्दांत अपराधी मनीराम सेन अब पुलिस की गिरफ्त में हैं।

भोपाल का सीरियल किलर मनीराम सेन 8 नवंबर को आदिल को मारने के बाद शाम को 7:30 बजे अपने परिवार के पास अशोका गार्डन स्थित किराए के घर में लौटा था। वह पूरी रात घर पर रहा और 9 नवंबर की सुबह 10:30 बजे घर से निकला। उसके बाद ही पुलिस घर पहुंची थी और उन्होंने मनीराम के बड़े बेटे जितेंद्र सेन को उठा लिया था। भास्कर से एक्सक्लूसिव बातचीत में सीरियल किलर मनीराम के बेटे जितेंद्र ने कहा कि पिता की दरिंदगी की वजह से भीख मांगने की नौबत आ गई है...

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हमें परिवार समेत भोपाल छोड़ना पड़ा है, हमारी दादी इमरत बाई भोपाल में भीख मांगती हैं। हमारे घर में आटा-दाल नहीं है, मांगकर खाना पड़ता है। मैं भोपाल में समोसे-कचौरी की दुकान चलाता था। अब वह बंद हो गई है। पिता से मेरा कोई वास्ता नहीं है। 2005 में पेरोल से भागने के बाद मेरी मां वैजयंती और छोटे बेटे ने ही पुलिस को इनफॉर्म करके पिता को पकड़वा दिया था। 2017 में छूटने के बाद वह घर कभी-कभी ही आता था। लेकिन लॉकडाउन लगने के बाद एक बार भी घर नहीं आया। लॉकडाउन खत्म हुआ तो वह घर आया। आदिल से उनकी जान-पहचान कैसे हुई और वह उनसे 17 हजार रुपए ले गया, इसकी जानकारी पुलिस से मिली थी।

हम सब अपने पिता से डरे रहते थे, वह 8 नवंबर को आदिल को मारने के बाद 7.30 बजे शाम को घर आ गए थे। वह रात को घर में ही रुके थे। खाना भी खाया था, लेकिन किसी से बातचीत नहीं की थी। सुबह मैं नाश्ता लेकर पहुंचा था, तो वह सीढ़ियों पर बैठे थे। सुबह 10.30 बजे वह चले गए, इसके बाद से हमसे कोई संपर्क में नहीं रहा। हमें क्या पता था कि वह फिर से इतनी बड़ी वारदात करके आए हैं।

हम सब डरे रहते थे, वो सिर्फ मां (बैजयंती ) से बात करते थे। इसके बाद चले जाते थे। मैं दो साल पहले उनसे अलग हो गया था, क्योंकि वह मेरी मेरी पत्नी को भी बरगला देते थे, कहते थे कि तुम्हारा पति कुछ नहीं करता है और खाली आवारा घूमता रहता है। इसलिए मुझे अलग होना पड़ा था। मां के साथ दो छोटे भाई रहते हैं। उन्हीं से मिलने आ जाते थे। 8 नवंबर की घटना के बाद अब हम सब विदिशा आ गए हैं। यहीं पर किसी तरह से मांगकर गुजारा कर रहे हैं।

वह खुद को तांत्रिक बताते थे, लेकिन घर में कभी भी उन्होंने तंत्र-मंत्र नहीं किया था। वह तो अंगूठा टेक थे, बिल्कुल पढ़े-लिखे नहीं थे। गुस्सैल स्वभाव के थे। एक बार वाद-विवाद में मम्मी को कुर्सी उठाकर मार दी थी, जिससे उनका सिर फट गया था। करीब 2 साल पहले एक बार उनकी तबीयत खराब हुई थी तो मैं उन्हें हमीदिया अस्पताल ले गया था और वहां उनके हाथ-पैर जोड़कर उन्हें मनाता रहा था कि जितने भी बुरे काम हैं, उसे छोड़ दीजिए। वरना पूरा परिवार परेशानी में फंसेगा लेकिन फिर भी वह नहीं माने। ठीक होने के बाद इधर-उधर आते जाते रहे। परंतु कहां जा रहे थे और क्या करते थे, ये हमें नहीं पता चलता है। क्योंकि बाप था हमारा इसलिए जब घर आता था तो कोई मना नहीं करता था। खुद से आता था, मिलता था, बात करता था। इसके बाद खुद ही चला जाता था। मैं और पूरा परिवार भोपाल से भागकर विदिशा आ गए हैं।

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