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  • 550 Years Ago On The Hill In The Midst Of The Dense Forest, The Bhils Established The Mother, Here Marriage Is Found Without A Muhurat For Marriage.

VIDEO: 1 KM ऊंचाई पर बैठी देवी मां की कहानी:1100 साल पुरानी है मूर्ति, यहां शादी का मुहूर्त नहीं होने पर ज्वार या गेहूं के दाने से गिनती करके शुभ दिन बताया जाता है

राजगढ़19 दिन पहले
एक किलोमीटर की चढ़ाई चढ़ भक्त मां जालपा के दर पर पहुंचे थे।

मप्र के राजगढ़ में जालपा माता मंदिर घने जंगलों के बीच विशाल टेकरी पर विराजित हैं। माता के दर्शन को मध्यप्रदेश के साथ ही राजस्थान और गुजरात से भी भक्त आते हैं। मान्यता है कि जब किसी के शादी-विवाह के लिए मुहूर्त नहीं निकलता तो वह जालपा मंदिर आते हैं यहां पर पुजारी से मुहूर्त निकलवाते हैं। यहां की पाती बिना किसी मुहूर्त का शुभ मुहूर्त होता है। जानिए... मां जालपा माता मंदिर की मान्यता, मूर्ति और उससे जुड़ी कहानियां

माता की मूर्ति के बारे में मान्यता है कि करीब 1100 साल पहले भक्त ज्वालानाथ की तपस्या से खुश होकर माता ने दर्शन दिए थे। इसके बाद यहीं पर पीपल के पेड़ के नीचे माता की मूर्ति मिली थी, बाद में जालपा पहाड़ी पर पाषण निर्मित माता की सिंह सवार प्रतिमा की चबूतरे पर स्थापना की गई थी।

प्रतिमा की स्थापना के बाद मंदिर की देखरेख राजगढ़ स्टेट के उमठवंशीय राजाओं और बाद में प्रशासन और मंदिर ट्रस्ट की जिम्मेदारी में आ गई। मंदिर और पहुंचने के लिए दो मार्ग हैं। यहां पर सड़क मार्ग के साथ सीढ़ियों से भी जाया जा सकता है। सुरक्षा के लिए यहां पर पुलिस चौकी भी स्थापित की गई है। मंदिर पहुंचने के लिए भक्तों को करीब एक किलोमीटर की चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। आज भी मंदिर के मुख्य सेवक भीलवंशीय ही हैं। यूं तो सालभर मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन नवरात्रि में यहां लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। नवरात्रि में राजगढ़ और आसपास के क्षेत्र के भक्त पदयात्रा कर माता को चुनरी चढ़ाते हैं।

भक्त पहले उल्टा स्वास्तिक बनाते हैं, मन्नत पूरी होने पर फिर सीधा स्वास्तिक बनाते हैं।
भक्त पहले उल्टा स्वास्तिक बनाते हैं, मन्नत पूरी होने पर फिर सीधा स्वास्तिक बनाते हैं।

शादी के लिए बिना मुहूर्त के मंदिर से मिलती है लग्नपत्री
जब शादी ब्याह के लिए कोई शुभ-मुर्हूत नहीं निकलता है तो परिजन मां जालपा मंदिर पहुंचते हैं। यहां से लग्नपत्री लेकर बिना किसी उलझन के वे बच्चों का विवाह संपन्न करवाते हैं। मंदिर से मिलने वाली वाली लग्नपत्री एक प्रकार से मंदिर के पुजारी द्वारा दिया गया शुभ मुहूर्त ही होता है, जो पाती के नाम से जाना जाता है। इसके लिए मंदिर के पुजारी माता के चरणों में अर्पित ज्वार या गेहूं के दाने की गणना विशेष पद्धति से करते हुए विवाह का मुहूर्त निकालते हैं। मुहूर्त निकलने के बाद पुजारी द्वारा एक विशेष प्रपत्र पर इस मुहूर्त की जानकारी लिखकर परिजनों को देते हैं। विवाह संपन्न होने के बाद नवदंपती सबसे पहले मां जालपा मंदिर पहुंचकर अपने विवाह के लिए मिली पाती को मंदिर में वापस रखकर वहां से माता का आशीर्वाद लेते हैं।

माता के सेवक विष्णु पंडा ने बताया कि 11 पीढ़ी से उनका परिवार माता की सेवा कर रहा है।
माता के सेवक विष्णु पंडा ने बताया कि 11 पीढ़ी से उनका परिवार माता की सेवा कर रहा है।

उल्टा स्वास्तिक बनाने से पूरी होती है मनोकामना
विशेष लग्न मुर्हूत के साथ ही मां जालपा का यह अति प्राचीन मंदिर अपनी एक और खास मान्यता के लिए जाना जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालु उल्टा स्वास्तिक (सातिया) बनाकर माता से अपनी मुराद मांगते हैं। इन श्रद्धालुओं की मुराद पूरी होने पर दोबारा मंदिर पहुंचकर गोबर का सातिया बनाया जाता है। इसी के साथ श्रद्धालु मंदिर में भंडारा, माता का विशेष श्रृंगार ओर अन्य दान-पुण्य कर माता का आभार जताते हैं। खास बात तो यह है कि मंदिर में सिंदूर से अधिक गोबर के सातिया बने हैं। जो माता द्वारा श्रद्धालुओं के मुराद पूरी होने की जानकारी देते हैं।

मप्र ही नहीं राजस्थान और गुजरात से भी भक्त माता के दर्शन को आते हैं।
मप्र ही नहीं राजस्थान और गुजरात से भी भक्त माता के दर्शन को आते हैं।

यह प्रचलित कथा भी है: राजा रात में मंदिर बनवाते, सुबह वह गिर जाता
माता के सेवक विष्णुनाथ पंडा ने बताया कि माता के प्रकट होने के बाद से ही हमारी 11 पीढ़ी से माता की सेवा करती आ रही है। उन्होंने कहा कि मान्यता है कि प्रतिमा करीब 1100 साल पहले धरती से निकली थी। पहले भील राजाओं ने माता को अपनी कुल देवी मानते हुए मंदिर निर्माण करवाना चाहा, लेकिन वे सफल नहीं हुए। वे दिन में मंदिर का निर्माण करवाते, रात में वह गिर जाया करता था। राजपूत राजा भी मंदिर नहीं बनवाया पाए। संभवत: माता इस प्रकार के धन भंडार से खुद के लिए छत नहीं चाहती थीं, बाद में जनसहयोग मंदिर बना। अभी मंदिर की देखरेख ट्रस्ट करता है।

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