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भास्कर पड़ताल:7 गांवों में 425 से अधिक अवैध भटि्टयां रोज बनती है 10 हजार लीटर कच्ची शराब

राजगढ़9 दिन पहले
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  • उज्जैन में 12 मजदूरों की मौत के मामले सेे सबक लेने की जरूरत

जिले के सात गांवों में रोजाना सवा चार सौ से अधिक भटि्टयों में रोजाना 10 हजार लीटर से अधिक अवैध कच्ची शराब बनाई जा रही है। यह शराब निर्धारित अड्‌डों पर बेचने के अलावा इसकी होम डिलेवरी भी की जाती है। इसके लिए पूरी योजना से काम होता है। इसके बनाने से लेकर मार्केटिंग व मैनेजमेंट तक की माफिया के अलग-अलग लोगों की जिम्मेदारी होती है। पिछले दिनाें कच्ची शराब पीने से उज्जैन में 12 से अधिक मजदूरों की मौत हो गई। इसकी जांच के लिए सरकार ने एसआईटी गठित की है, जो पूरे प्रदेश में इस तरह की शराब के निर्माण और काराेबार को लेकर जांच करेगी कि माफिया कहां से सामग्री लाता है और कौन-काैन इसमें शामिल हैं। यह जांच राजगढ़ तक पहुंचे या नहीं, लेकिन कहीं इस तरह की घटना जिले में भी ना हो जाए इसके लिए भास्कर ने चुनिंदा गांवों में अवैध शराब के काराेबार की पड़ताल की। इसमें पता चला कि इन साताें गांवों में कच्ची शराब बड़ी मात्रा में बनाई जाती है। स्थिति यह है कि रोजाना 425 से ज्यादा हाथ भट्‌टियाें से करीब 10 हजार लीटर से अधिक कच्ची शराब बनाई जाती है। पॉली पैक में 100 ग्राम से लेकर बाेतल और 5 लीटर की कैन तक में पैकिंग होती है। कई बार छापामार कार्रवाई कर भटि्टयों को नष्ट भी किया है,पर कुछ दिन में दोबारा यह कारोबार शुरू हो जाता है। अब ताे यहां कार्रवाई करने गई टीम पर भी माफिया हमले कर देते हैं।

अभी इन तीन तरीकों से बन रही शराब

महुआ शराब
तैयार अवधि : 4 से 6 दिन की प्रोसेस
लागत : करीब 60 रुपए प्रति लीटर
तरीका : महुआ को गलाने यूरिया डाला जाता है, इसका लहान तैयार होने पर भट्‌टी में उबालकर शराब तैयार होती है। लागत ज्यादा होने से उत्पादन कम हो रहा।
नुकसान : यूरिया से आंख की रोशनी, लीवर व किडनी खराब होती है। मेमोरी लोस, नपुसंकता जैसी बीमारियां भी घेर लेती है।

गुड़ शराब
तैयार अवधि : 3 से 5 दिन
लागत : करीब 50 रुपए प्रति लीटर
तरीका : गुड़ का लहान जल्दी तैयार करने यूरिया-केमिकल मिलाया जाता है। फिर भट्‌टी में उबालकर शराब तैयार होती है।
नुकसान : आंख की रोशनी कम हाेना, लीवर, किडनी खराब होने सहित स्मरण शक्ति में कमी, नपुंसकता जैसी बीमारियां घेरती है।​​​​​​​

ओपी शराब
तैयार अवधि : तुरंत तैयार होती है।
लागत : करीब 40 रुपए प्रति लीटर
तरीका : स्प्रिट खरीदकर उसे बिना मानक के अपने हिसाब से पानी में मिलाकर पैक किया जाता है।
नुकसान : स्प्रिट की अधिक मात्रा के चलते शरीर कमजोर होता है, वहीं आंख, लीवर, किडनी पर विपरीत प्रभाव, मेमोरी लोस व नपुसंकता की संभावना रहती है।​​​​​​​

बल कम है फिर भी करते हैं संयुक्त कार्रवाई

^हमारे पास बल बहुत कम मात्रा मे है, इसके बाद भी लगातार कार्रवाई कर रहे है। इन बड़े ठिकाने पर संयुक्त रूप से कार्रवाई होती है और हमने की भी है। आगे भी वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा कर योजना तैयार की जाएगी। -केएस मैकाले, जिला आबकारी अधिकारी राजगढ़​​​​​​​

बड़ी कार्रवाई और कुछ अन्य याेजना बनाएंगे

^हम जल्द ही इसको लेकर कार्ययोजना बना रहे हैं। जल्दी ही इस धंधे को खत्म करने बड़ी कार्रवाई के साथ ही अन्य कुछ याेजना भी बनाएंगे, इसके लिए अधिकारियाें की संयुक्त बैठक बुलाकर रणनीति तैयार की जाएगी। -नीरज कुमार सिंह, कलेक्टर राजगढ़​​​​​​​

ऐसे समझें जिले की खतरनाक स्थिति काे

​​​​​​​जिलेभर में सवा चार सौ से ज्यादा अवैध भटि्टयां संचालित है। इन गांवाें में छापाें और दबिश के दौरान मिलने वाली भट्‌टियाें और जब्त शराब व लहान से मोटा अंदाज लगाया जाए तो इन सात गांवों में रोजाना करीब 10 हजार लीटर शराब का उत्पादन होता है। ऐसा इसलिए क्याेंकि एक गांव की दबिश में एक ही भट्‌टी से 25 से 200 लीटर तक शराब बरामद हाेती है। यह प्रोसेस रोजाना की है। औसत उत्पादन एक से दो हजार लीटर एक गांव का रहता है।​​​​​​​

बड़ी कार्रवाई में ऐसी स्थिति सामने आई थी
27 सितंबर से पहले 2018 में 8 बार कार्रवाई की गई थी। इस दौरान 252 प्रकरण बनाकर 2727 लीटर देसी, 126 लीटर अंग्रेजी और 303907 लीटर महुआ लहान नष्ट किया था। इसकी बाजार कीमत 1 करोड़ 25 लाख 92 हजार थी। इसके बाद यह कारोबार फिर शुरू हो गया। 2019 में दोबारा इन गांवों में दबिश देकर इससे ज्यादा मात्रा में सामग्री जब्त कर भटि्टयों को नष्ट किया था।

माफिया इतना बैखोफ कि कर देता है हमले
माफिया इतना बेखाैफ हाे चुका है कि सैकड़ों की संख्या में पुलिस बल ले जाने के बाद भी आबकारी-प्रशासन और पुलिस की संयुक्त टीम पर हमला कर देते हैं। 27 सितंबर को कुछ गांवों में 50 वाहनाें की मदद से 300 पुलिसकर्मी पहुंचे थे। कलेक्टर एसपी की मौजूदगी के बाद भी एक अधिकारी की गाड़ी को हमले में फोड़ दिया था, पुलिस बल हथियारों से लैस था।

खतरा : एथिल की जगह मैथिल का होता है उपयोग
कच्ची शराब को पहले महुआ से बनाया जाता था, अब गुड से तैयार की जाती है। जल्दी बनाने यूरिया का उपयोग होता है लेकिन अब अधिकांश गांवों में ओपी (ओवर प्रुफ) से भी शराब बनाई जाने लगी जिसे यूपी (अंडर प्रुफ) में बदला जाता है। यह शरीर के लिए घातक है क्योकि अवैध रूप से मंगाई जाने वाले ओपी में मैथिल एल्कोहल (जहरीली) होती है। इसकी मात्रा व मानक भी तय नहीं होता।​​​​​​​



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