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दुर्लभ मनुष्य:पृथ्वी पर भार नहीं बल्कि, आभारी बन के अपनी आत्मा का कल्याण करें: मुनिश्री

सीहोर2 महीने पहले
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दुर्लभ मनुष्य जीवन के लिए देवता भी तरसते हैं। महापुरुषों के प्रेरणास्पद जीवन से शिक्षा लेते हुए हमें अपने जन्म को सार्थक करना है। पुण्यशाली मां की कोख से भव्य जीवों का जन्म होता है। तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध अनेक जन्मों के संचित पुण्य से ही सम्भव होता है। मनुष्य जन्म लेकर मानवता को अपनाना ही होगा तभी हम आत्मा का कल्याण करके जन्म मरण के चक्र से मुक्ति पा सकते हैं। यह बातें मुनिश्री अजित सागर महाराज ने गांव मैना में चल रहे पंच कल्याणक महोत्सव में भगवान के जन्मकल्याणक दिवस पर अपने प्रवचन में यह बात कहीं। जन्म कल्याणक विशेष : मैना स्थित अयोध्या नगरी में भगवान के पंच कल्याणक की धार्मिक क्रियाएं विधि विधान से जारी हैं। श्रावकों के अपार उत्साह और पवित्र वातावरण में तीर्थंकर शिशु का जन्म कल्याणक मनाया गया। मुनि संघ के सानिध्य में प्रतिष्ठाचार्य विनय भैया के निर्देशानुसार धार्मिक कार्यक्रम सम्पन्न किए गए। जन्म क्रियाओं की धार्मिक और लौकिक रस्मों के साथ ही प्रातःकाल में नित्य नियम पूजन, शांति धारा और विश्व शांति की कामना लिए अर्घ्य चढ़ाए गए। भगवान के जन्म के साथ ही हर्ष के वातावरण में मंगल ध्वनि, देव दुंदुभि और गगन भेदी जयकारों के बीच भक्तिमय माहौल में समूची अयोध्या नगरी झूम उठी। जन्म पश्चात सौधर्म इंद्र-इंद्राणी बालक तीर्थंकर स्वरूप प्रतिमा को ऐरावत हाथी पर सवार हो अयोध्या नगरी की परिक्रमा पर ले गए। चल समारोह के रूप में निकली शोभायात्रा में स्थानीय ग्रामवासियों सहित जैन जैनेतर श्रद्धालु शामिल हुए। श्रद्धालुओं के नृत्य और जयकारों से नयनाभिराम दृश्य देखने को मिला। अनेक स्थानों पुष्प वर्षा कर चल समारोह का स्वागत किया गया। बाद में सौधर्म इंद्र भगवान को सुमेरु पर्वत पर ले गए जहां मंत्रोच्चार के साथ 1008 कलशों से भगवान का अभिषेक किया गया।

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