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  • Women Collected Money First, Then Joined The Grocery And Other Business In Groups, Now Savings Of 60 Lakh Rupees In The Accounts Of 200 Groups Of 33 Villages

आत्मनिर्भर महिला शक्ति:पहले महिलाओं ने इकट्ठे किए रुपए, फिर समूहों में किराना व अन्य व्यवसाय से जुड़ीं, अब 33 गांव के 200 समूहों के खातों में 60 लाख रुपए की बचत

सीहोर9 महीने पहले
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  • जागृति महिला संस्थान ने बुदनी विकासखंड में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के सपने को किया साकार

एक समय ऐसा था कि जब गांव की महिलाओं को साहूकारों से कर्ज लेना पड़ता था, लेकिन आज किसी भी छोटी-मोटी परेशानी के लिए यह अपने समूहों से पैसा लेती हैं और उसे ब्याज सहित वापस करती हैं। बुदनी विकासखंड के 33 गांव के 200 महिला समूह से आज 2 हजार 157 महिला जुड़ चुकी हैं, जो आज किराना व्यवसाय से लेकर अन्य कारोबार कर आत्मनिर्भर बन चुकी हैं।

इन महिलाओं के समूह ने रोजमर्रा के खर्चों में बचत कर आपसी आंतरिक लेनदेन शुरू किया और 130 समूह किराना व्यवसाय के अलावा अन्य कारोबार से जुड़ीं। आज इन 33 गांवों के 200 समूहों के पास 60 लाख रुपए की बचत है। 2018 में रेडी के कुछ गांव से महिला जागृति संस्थान से महिलाएं जोड़ी। 100 रुपए पर 2 रुपए प्रति महीना ब्याज लिया गया। इस छोटी-छोटी बचत से इन समूहों के पास काफी रुपए खातों में जमा होने लगे। इसके बाद इन्होंने अपना एक फेडरेशन बनाया, जिसमें सभी समूहों को सदस्यता शुल्क 100 रुपए वार्षिक जमा करना पड़ता है।

आपदा में अवसर....लॉकडाउन ने सिखाया व्यवसाय
जागृति महिला संस्थान की संतोषी तिवारी बताती हैं कि कोरोना काल में जब लॉकडाउन शुरू हुआ तो इससे पहले कुछ समूहों ने अपनी किराना दुकान शुरू की थी। लॉकडाउन शुरू होने से पहले इन समूहों की महिलाओं ने भोपाल और अन्य थोक की दुकानों से सामान खरीद कर रख लिया और इसके बाद लॉक डाउन के समय इस सामान को वाजिब दामों में बेचा।

इस तरह इसी समय 130 समूहों ने किराना दुकान खोलीं। इसी के साथ कुछ समूह की महिलाएं सब्जी कारोबार से भी जुड़ी हैं। आज यहां के समूह मछली-पालन, मनिहारी, हाट बाजार में दुकानें लगाना, बकरी पालन, मास्क बनाने का काम भी कर रहे हैं। कुछ समूह अपने खेतों में तैयार दाल को बेचने का काम कर रहे हैं, तो कुछ जैविक खाद बनाने का काम कर रहे हैं

परिजनों को साहूकारों के सामने नहीं फैलाना पड़ते हाथ
सेमल पानी की दीपिका आज किराना दुकान चला रही हैं, तो बबीता मनिहारी और श्रद्धा सजावट का सामान तैयार करती हैं। इन महिलाओं का कहना है कि आज वह आत्मनिर्भर हो चुकी हैं । मर्दानपुर की कविता बताती हैं कि उन्होंने कोरोनाकाल मे पत्तल दोने बनाने का काम शुरू किया था। अब उससे अच्छी आमदनी हो रही है। महिलाओं का कहना है कि आज उन्हें साहूकारों के आगे हाथ फैलाना नहीं पड़ता है।

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