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प्रवचन:करनी और नहीं करनी के इस भेद को एक शिक्षक ही मिटा सकता है- मुनिश्री

विदिशा20 दिन पहले
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  • शीतल धाम में सौम्य सागर महाराज ने सांस्कृतिक सभ्यता और विरासत पर भी बोला

देश का दुर्भाग्य देखिए जो देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं हैं जिनको शिक्षा देने का कार्य करना चाहिए था वह तो बड़ी बड़ी मल्टी नेशनल कंपनियों में अपनी योग्यता से जगह बना कर स्थान पा जाता है तथा जिनको कहीं पर भी जगह नहीं मिलती वह फिर इस देश का अतिथि शिक्षक या शिक्षक बनकर देश के नौनिहालों को शिक्षा को प्रदान करता है। उपरोक्त उदगार मुनि सौम्य सागर महाराज ने शीतल धाम में आयोजित शिक्षक सम्मान समारोह के अवसर पर व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि शिक्षा सांस्कृतिक सभ्यता और विरासत जो कि बिखरी हुई पड़ी है उस विरासत को एक दूसरे को प्रदान करने का सबसे महत्वपूर्ण साधन है। आचार्य गुरुदेव विद्या सागर महाराज कहते हैं कि एक शिक्षक 100 जेलों को बंद करता है तो आप पूछेंगे कैसे? प्रति प्रश्न करते हुए आचार्य श्री कहते हैं कि जेलों में कौन व्यक्ति जाता है? उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अपनी सभ्यताऔर संस्कृति के विरुद्ध आचरण करता है उसी व्यक्ति को संसार की इस जेल में तथा कर्मों की उस जेल में यात्रा करनी पड़ती है।

प्रतिभाओं को मूर्त रुप प्रदान करने का कार्य हमेशा ही करता है शिक्षक

जैसे एक पाषाण को एक शिल्पकार अपनी कुशलता से एक सुंदर प्रतिमा का रूप प्रदान कर देता है उसी प्रकार इन अनगड़ प्रतिभाओं को मूर्त रुप प्रदान करने का काम एक शिक्षक करता है। उन्होंने कहा कि मात्र छैनी हतोड़ा चलाने का नाम शिल्पी नहीं है बल्कि उस पाषाण में कहां कहां खोट है उस खोट को निकालने की कला का नाम शिल्प है। जिसको यह कला आती है वही उन पाषाण से छैनी और हतोड़ा के माध्यम से खोट को निकाल कर एक श्रेष्ठ प्रतिमा को साकार रुप प्रदान करता है।

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