महिला शक्ति को नमन:पति की मौत के बाद सिलाई कर 4 बच्चों की परवरिश कर रहीं मिथिलेश

विदिशा9 महीने पहले
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  • विश्व की सबसे बड़ी आपदा ‘काेरोना’ में नहीं टूटा हौसला, परिवार की गृहलक्ष्मी के संघर्ष की 2 सच्ची घटनाएं

कोरोना में पति की मौत, फिर घर की पूरी जिम्मेदारी गृहलक्ष्मी पर, लेकिन वे हारती नहीं। परिवार को चलाने के लिए उसने नई राह चुनी। कभी अपने हौसले को कमजोर नहीं होने दिया। इसकी बदौलत आज वे निरंतर आगे बढ़ रही हैं। पीछे मुड़ने का तो सवाल ही नहीं.. ऐसी महिला शक्ति को नमन.....

काेरोना ने छीना पति का साथ, हौसला बरकरार

मेरा नाम मिथिलेश यादव है... विदिशा में रहती हूं। काेरोना के दौरान जुलाई 2020 को बीमारी के चलते पति जसवंत की मौत हो गई। इस घटना से मैं पूरी तरह से टूट गई थी। आर्थिक स्थिति पहले से ठीक नहीं थी, लेकिन फिर चार बेटियों के बारे में सोचा... तो न जाने कहां से हिम्मत आ गई। रुपए जमा कर सिलाई मशीन खरीदी और सिलाई का काम शुरू किया। कपड़े की दुकान के आर्डर लेकर घर से ही काम करना शुरू किया, लेकिन अभी उतना नहीं कमा पाती कि घर अच्छे से चल सके। फिर भी हौसला है। मैं अशिक्षित हूं। 4 बेटियों में सबसे बड़ी 13 साल की है और 2 बेटी जुड़वा हैं, जो 6 साल की हैं। सिलाई के काम को और बढ़ाना ही है।

घरों से काम छूटा तो खुद का टिफिन सेंटर खोला, आज 15000 कमा रहीं

घरों में काम कर 4000 रुपए माह कमा रही थी, लेकिन कोरोना में छूटे सारे

जिंदगी जीने का नाम है, मुर्दा दिल क्या खाक जिया करते हैं... ऐसी ही कुछ गंजबासौदा निवासी 40 वर्षीय भागवती रैकवार की जिंदगी की कहानी है। भागवती बताती है कि पति की मौत 10 साल पहले ही हो गई तो घर की जिम्मेदारी मुझ पर ही आ गई। लोगों के घरों में काम कर घर की आर्थिक स्थिति से उतरी गाड़ी को फिर से पटरी पर लाने के लिए लोगों के घरों में काम शुरू किया। लेकिन कोरोना के कारण वह भी छूट गया। संक्रमण के डर से लोगों ने काम ही नहीं दिया। मन व्याकूल था, कि अब क्या....फिर पता चला कि बाहर से कई लोग भी अपने घर नहीं जा पा रहे हैं।

बचे हुए रुपयों से सामग्री लाकर उनके लिए दोनों समय का खाना पहुंचाना शुरू किया। आखिरकार धीरे-धीरे 9 माह में काम काफी जम गया। आज खुश हूं मेरा खुद का व्यापार है... जहां मैं घरों में काम कर 4 हजार रुपए माह कमाती थी। आज 50 लोगों को टिफिन पहुंचाकर 15000 रुपए कमा रही हूं। मेरे तीन बच्चों में दो मेरे इस व्यापार में हाथ बटाते हैं, जबकि तीसरा छोटा बेटा बीए प्रथम वर्ष में पढ़ रहा है। कभी सोचती हूं... कि सोच बड़ी हो तो उम्मीदों के पर अपने आप ही उड़ान भरने शुरू कर देते हैं।

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