रावण गांव से रावण की कहानी:कोई भी शुभ काम रावण की पूजा से होती है शुरू, रावण को बाबा के नाम से पुकारते हैं ग्रामीण

विदिशा7 दिन पहले
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बाबा की लेटी हुई मुर्ति - Dainik Bhaskar
बाबा की लेटी हुई मुर्ति

भारत में विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में रावण दहन किया जाता है। रावण को बुराई का प्रतीक माना जाता है। लेकिन हमारे देश में एक ऐसा गांव है, जहां रावण की पूजा प्रथम पूज्य देवता के रूप में की जाती है । इतना ही नहीं गंव का नाम भी रावण है। ये गांव विदिशा जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर है।

प्रथम पूज्य है रावण बाबा
इस गांव में रावण को रावण बाबा कहा जाता है। और रावण बाबा की अन्य देवताओं के साथ पूजा की जाती है। इतना ही नहीं, इन लोगों के लिए रावण इतने पूजनीय हैं कि ये लोग कोई भी शुभ काम करने से पहले रावण की मूर्ति के सामने दंडवत प्रणाम कर उनकी नाभि में तेल लगाकर शुरुआत करते हैं।

विशेष पूजन कर मनाते है दशहरा
गांव में दशहरा विशेष पूजन कर मनाया जाता है। लेकिन रावण दहन नहीं होता। दहन की जगह भंडारा करवाया जाता है। रावण भी कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे और इस गांव में 90 प्रतिशत कान्यकुब्ज ब्राह्मण रहते हैं। और रावण को वे पूर्वज और देवता की तरह पूजते हैं।

गांव में रावण बाबा का मंदिर
गांव में रावण बाबा का मंदिर

रावण बाबा की कहानी
गांव के लोगों के बीच एक किंवदंती मशहूर है। कहा जाता है कि पुराने समय में गांव के पास स्थित बूधे की पहाड़ी पर एक राक्षस रहता था। इस राक्षस को सिवाय रावण के कोई नहीं हरा पाता था। कहा जाता है कि जब राक्षस रावण के सामने जाता था, तो उसकी ताकत कम हो जाती थी। इस बात का पता जब गांव वालों को चला, तो उन्होंने गांव में रावण की बड़ी मूर्ति बना दी। जिसके बाद से राक्षस गांव में नहीं आया।

रावण का है मंदिर
दशहरे पर गांव के लोग रावण बाबा की पूजा कर उन्हें भोग अर्पित करते हैं। ग्रामीणों के मुताबिक यहां सदियों से रावण की विशाल प्रतिमा जमीन पर लेटी अवस्था में है। इस प्रतिमा को आज तक कोई हिला भी नहीं ́पाया। श्रद्धालुओं के सहयोग से यहां रावण बाबा का मंदिर बन चुका है। जो देश में रावण बाबा का दूसरा मंदिर माना जाता है। दशहरे के दिन सुबह से रावण बाबा की पूजा शुरू की जाती है।

रावण बाबा मंदिर के पुजारी नरेश महाराज बताते हैं कि मूर्ति चैत्नय है। आसपास के अनेक गांव के लोग यहां पूजन करने आते हैं। सभी धार्मिक और मांगलिक कार्यों की शुरुआत यहां पूजन करके की जाती है। रावण बाबा यहां आराम मुद्रा में विराजित है। इसके पीछे यह कहानी है कि यहां पास में बूधे की टोरिया पर एक दानव रहता था। बाबा और उस राक्षस का युद्ध हुआ। जिसमें रावण की जीत हुई। बाबा उसे मारकर यहां आराम कर रहे हैं, पास के तालाब में उनकी तलवार भी गड़ी हुई है। जो अभी भी थोड़ी-थोड़ी दिखाई देती है।

रावण गांव निवासी अभय तिवारी ने बताया कि रावण हमारे लिये प्रथम पूज्य हैं। सभी मांगलिक कार्य उनकी पूजन के बाद ही शुरू होते हैं। दशहरे के दिन विशेष पूजा की जाती है। रावण बाबा से हमारी गहरी आस्था जुड़ी है। इसलिए वाहनों, मकानों और शरीर पर हमने जय लंकेश लिखवा रखा है।

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