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प्रेम का भाव निरंतर:जो वक्त निकल चुका है उसमें अपना समय मत गंवाओ: मुनि समता सागर महाराज

विदिशा11 दिन पहले
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विज्ञान ने भी यह सिद्ध किया है कि जिन जीवों में दया, करूणा और प्रेम का भाव निरंतर बढ़ता जाता है उन जीवों के रक्त में संवेदनाओं के कारण स्वेत कणिकाओं की संख्या बढ़ती जाती है। यह कहना गलत नहीं है कि तीर्थंकरों का रक्त जन्म के समय से ही दूध के समान सफेद होता है। यह उनके जन्म जन्मांतर के संचित पुण्य के कारण होता है। उपरोक्त उद्गार मुनि समता सागर महाराज ने शीतलधाम पर जैन तत्व बोध पर तीर्थंकरों के अतिशय बताते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आजकल यदि किसी को पसीना न आए तो वह परेशान हो जाता है कि पसीना क्यों नहीं आ रहा। वहीं तीर्थंकर बालक जन्म से ही स्वेद रहित होते है। उनका निर्मल शरीर और स्वेद रक्त उनके जन्मजन्मान्तर के पुण्य के प्रभाव से होता है। उन्होंने कहा कि हमारे आपके औदारिक शरीर के अंदर जो विकृतियां होती है वह उनके नहीं होती है। तीर्थंकर बालक के जन्म के समय से ही 56 देवियां सेवा में हाजिर हो जाती है। श्रम रहित जीवन बीमारियों का घर बन जाता है: उन्होंने चर्चा करते हुए कहा कि पहले के जमाने में संयुक्त परिवार हुआ करते थे तो वालक के गर्भ के समय परिवार की चाचियां, भाभियां, नंद, देवरानियां एकत्रित हो जाया करती थी। घर में वैसे ही उत्सवी माहौल हो जाया करता था लेकिन आजकल तो हम दो हमारे दो बाकी बचे सो फेंक दो। फिर कहां से आएं सेवा करने वाली देवरानी, वुआ, चाची। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि ग्रामीण परिवेश में तो आज भी ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे लेकिन शहर में मिलना मुश्किल है। अपने गृहस्थ जीवन के पिता राजाराम जो कि सामने ही बैठे थे को इशारा करते हुए कहा कि देख लो इनके 11 बच्चे थे। पांच भाई और छह बहनें और सभी लोग स्वस्थ है और खुद राजाराम जी भी 85 वर्ष की उम्र है। खेती किसानी के साथ प्रकृति में रहकर यह शरीर ढला है सो बीमारियों से भी दूर है। उन्होंने कहा कि श्रम रहित जीवन बीमारियों का घर बन जाता है आजकल तो एसी कमरा और पंखे में इस शरीर से पसीना ही नहीं निकल पाता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में शरीर का इतना श्रम भी नहीं है और उतनी मेहनत भी नहीं है तो शरीर अस्वस्थ हो जाता है। उन्होंने तीर्थंकरों के गुणों का बखान करते हुए अनुपम रूप तो होता ही है उनका शरीर भी सुगंधित होता है। अब आजकल कहां सुगंधित शरीर बचे है। पास में बैठ जाओ तो पसीने की बदबू से ही इंसान परेशान हो जाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि एक व्यक्ति एक बार तेल से लगा वस्त्र लेकर किसी धोबी के यहां गया और कहा कि इसको साफ कर दो तब धोबी ने कहा कि बाजू में कोल्हू चल रहा है उसमें पिरवा लो कम से कम तेल तो मिल ही जाएगा। जो वक्त निकल चुका है उसमें अपना समय मत गंवाओ बल्कि आने वाले समय का सदुपयोग उसकी सही संयोजनाओं से अपने जीवन को निखार सकते हैं।

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