हरिद्वार में उदासी संत संप्रदाय की दीक्षा ग्रहण की:यूनान ने मूल संस्कृति खो दी, लेकिन भारत उसे बचाने में कामयाब रहा: साध्वी राधेमुनि

विदिशा9 महीने पहले
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  • 1989 में यूनान से भारत आईं, आध्यात्म से प्रभावित होकर हिंदू धर्म अपनाया

दुनिया में सांस्कृतिक मूल्यों की ऊहापोह चली और कई संस्कृतियां तो अपना मूल स्वभाव लगभग खो ही चुकीं। यूनान अथवा ग्रीक की संस्कृति भी आज जिस स्वरूप में है उसमें यूनान का अपना कुछ भी नहीं है। वहीं तमाम आक्रमणों और हमलों के लगातार आघात सहने के बाद भी भारत की संस्कृति ने अपना मूल स्वभाव बचाए रखा, यह विशेष उल्लेखनीय बात है। यह बात यूनान(ग्रीक) से आकर भारत में बसी साध्वी राधे-मुनि द्वारा विदिशा में स्थित हेलियाडोरस स्तंभ परिसर में कही।

वे रविवार को विदिशा नगर और आसपास के ऐतिहासिक स्थलों और पुरा-महत्व के स्मारकों का भ्रमण करने तीन दिवसीय यात्रा पर पहुंची थीं। वे 1989 में नेपाल के रास्ते गोरखपुर आई थीं और इसके बाद वहां से हरिद्वार में उदासी संत संप्रदाय की दीक्षा ग्रहण की थी। वर्तमान में वे नर्मदा के तट पर बांद्राभान में आश्रम में निवास करती हैं। वे कहती हैं कि गुरू आज्ञा है इसलिए अपने अतीत के बारे में ज्यादा नहीं बताना चाहती।

हेलियाडोरस स्तंभ देखकर साध्वी थोड़ी देर के लिए खुश हुईं बोली कि अगर हेलियाडोरस भारत का पहला यूनानी वैष्णव हिंदू था, तब मैं भी दो हज़ार साल बाद भारत की पहली यूनानी महिला संन्यासिन हुई। अरविंद शर्मा ने उन्हें हेलियाडोरस के बारे में जानकारी दी।

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