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  • Green Area Near Rangai; There The Approval Of Commercial And Mixed Land, Where The Boat Runs In The Rain, It Is Shown Residential.

विजन-2035 मास्टर प्लान के नए‎ ड्राफ्ट में अजब-गजब खामियां:रंगई के पास ग्रीन एरिया; वहां कमर्शियल व मिक्स लैंड की‎ मंजूरी, बारिश में जहां चलती है नाव, उसे दिखाया आवासीय‎

विदिशा‎एक महीने पहलेलेखक: अरुण त्रिवेदी
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ढोल खेड़ी चौराहे के आसपास बने मकान‎ - Dainik Bhaskar
ढोल खेड़ी चौराहे के आसपास बने मकान‎
  • ‎आपत्तियों के निराकरण के बाद शासन के पास मंजूरी के लिए भेजा‎

विजन-2035 के नाम से विदिशा का नया‎ मास्टर प्लान तैयार किया जा रहा है। इसके‎ ड्राफ्ट को जिला स्तर पर आपत्तियों के‎ निराकरण के बाद प्रदेश शासन के पास‎ मंजूरी के लिए भेजा गया है। शहर के मास्टर‎ प्लान के नए ड्राफ्ट में एक के बाद एक कई‎ अजब-गजब खामियां सामने आ रही हैं।‎

इसमें रंगई के पास जहां बेतवा से पहले जहां‎ पीलिया नाला है, वहां पहले से ग्रीनलैंड‎ एरिया घोषित है, लेकिन अब नए ड्राफ्ट में‎ वहां रोड किनारे मिक्स लैंड और कमर्शियल‎ लैंडयूज पर सहमति जताई गई है।

इसी प्रकार‎ शहर में रामलीला चौराहे से आगे जहां‎ बेतवा का नया पुल बना है, वहां से आगे‎ शहर को समाप्त मान लिया गया है, वहां पर‎ एग्रीकल्चर लैंड बताई जा रही है। लेकिन‎ उसके बाद बैस नदी के पार ढोल खेड़ी‎ चौराहे तक 10 से ज्यादा अवैध कालोनियां‎ काटी जा चुकी हैं।

5 से ज्यादा मैरिज गार्डन‎ बन चुके हैं। वाहनों के शोरूम भी संचालित‎ हो रहे हैं। शहर का मास्टर प्लान धरातल पर‎ नहीं बनने के कारण अवैध कालोनियां‎ पनपती हैं। जैसे ढोल खेड़ी एरिया, सागर‎ रोड, सांची रोड पर जहां एग्रीकल्चर लैंड‎ बताई जा रही है, वहां 30 से ज्यादा अवैध‎ कालोनियां कट चुकी हैं।

यदि यहां 2035 के‎ नए ड्राफ्ट में आवासीय इलाका घोषित कर‎ दिया जाता तो लैंडयूज आसानी से चेंज हो‎ जाता और वहां वैध कालोनी बन सकती‎ थी।लेकिन अब इन इलाकों में कोई‎ कॉलोनाइजर चाहकर भी कालोनी निर्माण‎ की अनुमति नहीं ले सकता। अवैध कालोनी‎ में पक्की रोड, ड्रेनेज सिस्टम, स्ट्रीट लाइट‎ नहीं होने से रहवासियों को बेवजह परेशान‎ होना पड़ता है।‎

ढोल खेड़ी चौराहा पर पहले से 10 कॉलोनियां विकसित , अब एग्रीकल्चर लैंड किया घोषित‎

जहां एग्रीकल्चर‎ लैंड उससे 500 मी.‎ आगे कमर्शियल‎
मास्टर प्लान की खामियों पर‎ नजर डालें तो पता चलता कि‎ शहर में ईदगाह चौराहे से आगे‎ सांची रोड पर जहां अभी वर्तमान‎ में मैरिज गार्डन और कालोनियां‎ बनी हैं, उसे एग्रीकल्चर लैंड‎ बताया गया है।इससे भी ज्यादा‎ मजेदार यह है कि इसी रोड पर‎ यहां से 500 मीटर आगे रंगई‎ हनुमान मंदिर से पहले जहां ग्रीन‎ लैंड है, वहां मिक्स लैंड और‎ कमर्शियल लैंड की मंजूरी दी गई‎ है।

यह कैसे संभव है कि ईदगाह‎ चौराहे के पास जहां एग्रीकल्चर‎ लैंड है, उसी रोड पर उससे आधा‎ किमी आगे जाकर वह इलाका‎ कमर्शियल हो जाता है जबकि यह‎ बेतवा का हाई फ्लड एरिया है।‎ इस पर शासन को गौर करना‎ चाहिए।ड्राफ्ट की खामियों को‎ सुधारना चाहिए।‎

सबसे मजेदार विसंगति... पातंजल योगावर्त के पास हर‎ साल बारिश से होती है तबाही, अब बनेगी कॉलोनी‎
मास्टर प्लान के नए ड्राफ्ट‎ में एक और बड़ी मजेदार‎ विसंगति यह है कि‎ पातंजल योगावर्त के पास‎ जहां हर साल बारिश में‎ बेतवा और पीलिया नाले‎ का पानी शहर में घुसकर‎ तबाही मचाता है। बाढ़ में‎ फंसे लोगों को नाव‎ चलाकर निकालना पड़ता‎ है, वहां पर मास्टर प्लान में‎ आवासीय कालोनियों को मंजूरी दी गई है। 2019 की‎ बेतवा की बाढ़ में यहां से‎ नाव चलाकर लोगों की‎ जान बचाई गई थी। इसके‎ बाद भी यहां कालोनियों को‎ मंजूरी दी गई है।‎

सिर्फ राज्य शासन के‎ पास ही लैंडयूज बदलने‎ का अधिकार रहता है‎
भूमि विकास अधिनियम में लैंडयूज‎ बदलने का अधिकार राज्य शासन के‎ पास ही होता है। मास्टर प्लान से अलग‎ हटकर जब लैंड यूज बदलना होता है तो‎ उसमें आवेदक टाउन एंड कंट्री प्लानिंग‎ विभाग को अपना आवेदन सबमिट करता‎ है। इसके बाद टीएंडसीपी सुनवाई एवं‎ संतुष्टि के पश्चात एक मीटिंग बुलाता है।‎

इसमें टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग के‎ डायरेक्टर, प्लानिंग आफीसर, सीएमओ‎ और संबंधित कलेक्टर शामिल होते हैं।‎ इसके लिए आवेदक से 5 प्रतिशत लेवी‎ शुल्क भी लिया जाता है। लेकिन जब‎ आवेदन को नियमानुसार मंजूरी नहीं‎ मिलती है तो आवेदन अपनी मनमर्जी से‎ अवैध कालोनियां काट देते हैं। मैरिज‎ गार्डन बना लेते हैं। इसमें एक सवाल यह‎ भी उठता है कि जब लैंड यूज चेंज नहीं‎ होता है तो वहां आवासीय डायवर्सन कैसे‎ हो जाता है।‎

अवैध कॉलोनी को कैसे मिलती है बिल्डिंग परमिशन‎
शहर में बिल्डिंग परमिशन के लिए नगरपालिका अधिकारी की विजिट होने‎ के बाद वहां मौके पर जाकर सेल्फी लेने का नियम है। ऐसी स्थिति में जो‎ अधिकारी मौके पर जाते हैं क्या वे वहां पर वैध और अवैध कालोनी का अंतर‎ पहचान नहीं पाते हैं या फिर उनकी सहमति रहती है।

ऐसे में सवाल यह भी‎ उठता है कि टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग को भ्रमण कर अवैध कालोनी की‎ सूचना देनी होती है। इसमें प्रशासन को यह देखना चाहिए कि 10 सालों में‎ कितनी अवैध कालोनियों की सूचना दी गई।‎

एक बीघा में 7.31 लाख के‎ राजस्व का होता है नुकसान‎
उदाहरण के लिए शहर के मास्टर प्लान में ढोल‎ खेड़ी इलाके को एग्रीकल्चर लैंड बताया गया है‎ जबकि यहां पहले से 20 कालोनियां कट चुकी‎ हैं। एक बीघा जमीन में 2091 वर्ग मीटर जमीन‎ होती है। मान लिया जाए कि प्रचलित कलेक्टर‎ गाइड लाइन के मुताबिक इस इलाके में जमीन‎ के भाव औसतन 7000 रुपए प्रति वर्ग मीटर‎ चल रहे हैं।

ऐसे में 2091 वर्ग मीटर जमीन की‎ कीमत यहां 1.46 करोड़ रुपए होती है। यदि‎ यहां लैंड यूज चेंज कर कालोनियां काटी जातीं‎ तो इसमें 5 प्रतिशत लेवी शुल्क के हिसाब से‎ 7.31 लाख रुपए का राजस्व शासन को प्राप्त‎ होता, लेकिन यहां मास्टर प्लान की खामियों के‎ कारण ऐसा नहीं हो पा रहा है।

इस तरह यदि‎ मान लिया जाए कि 10 बीघा में एक कालोनी‎ बनी है तो 20 कालोनियों का लेवी शुल्क‎ 10.45 करोड़ रुपए तक पहुंच जाता है। इसके‎ अलावा सांची रोड पर 8, सागर रोड पर 10 से‎ ज्यादा अवैध कालोनियां कट रही हैं।‎

डायरेक्टर को दी है‎ खामियों की जानकारी‎

  • मास्टर प्लान के नए ड्राफ्ट में जो खामियां‎ और विसंगतियां सामने आ रही हैं, उनकी‎ जानकारी टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग के‎ डायरेक्टर और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को‎ दी गई है। इसमें यथोचित संशोधन करवाने‎ का प्रयास किया जाएगा।‎ - उमाशंकर भार्गव, कलेक्टर विदिशा‎
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