भास्कर खास:रावण को मानते हैं ईष्ट देव, हर शुभकार्य से पहले करते हैं पूजन, नहीं होता दहन

विदिशाएक महीने पहलेलेखक: गिरिजाशंकर तिवारी
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गांव के सभी लोग रावण नहीं बोलकर सम्मान के रूप में रावण बाबा ही बोलते हैं। - Dainik Bhaskar
गांव के सभी लोग रावण नहीं बोलकर सम्मान के रूप में रावण बाबा ही बोलते हैं।

जिला मुख्यालय से करीब 40 किमी दूर नटेरन तहसील के रावण गांव में 15 अक्टूबर को दशहरे पर लंकापति रावण के पुतले का दहन नहीं होगा। दहन की बजाय गांव के लोग दशानन रावण प्रतिमा की पूजा-अर्चना करेंगे। प्रतिमा के बीच के हिस्से में बनी नाभि में गांव के लोग पूजा अर्चना के साथ ही खादय तेल से भीगी हुई रुई लगाएंगे।

रावण मंदिर के पुजारी पंडित नरेश तिवारी का कहना है कि दशानन का वध भगवान श्रीराम के तीर के लगने से हुआ था। यह तीर दशानन की नाभि में लगा था। गांव के लोगों की मान्यता है कि खादय तेल से भीगी हुई रुई लगाने से दशानन की नाभि में मरहम लगेगा। इससे उनका दर्द कम होगा।

यह सिलसिला गांव में पीढ़ियों से चला आ रहा है। पं. तिवारी का कहना है कि गांव के लोग दशानन को अपना इष्ट मानते हैं। इसलिए हर शुभ कार्य से पहले उनका पूजन करते हैं। गांव के सभी लोग रावण नहीं बोलकर सम्मान के रूप में रावण बाबा ही बोलते हैं।

प्रतिमा तीसरी शताब्दी की

रावण की प्रतिमा की चौड़ाई 3 फीट है और लंबाई 12 फीट है। ऊपरी हिस्से में नंदी के पैर दिखते हैं, वहीं दोनों हाथ में हिरण है। कमर में मृग छाल नजर आता है। इतिहासकार और विद्वान गोविंद देवलिया का कहना है यह प्रतिमा तीसरी शताब्दी की मानी जाती है।