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एक दूसरे से उलझती घटनाएं / हमारा विदिशा निरापद है, प्रवासी मजदूरों की पीड़ा मिटाता, धूप में जलते पांवों में चप्पल पहनाता भोजन बांटता, मास्क पहनाता, सेवाभाव को विरासत में लेकर ही तो आज उतना परेशान नहीं है

Our Vidisha is safe, eliminates the pain of migrant laborers, wears slippers in sun-lit feet, distributes food, wears masks, inheritance of service is not so much today
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Our Vidisha is safe, eliminates the pain of migrant laborers, wears slippers in sun-lit feet, distributes food, wears masks, inheritance of service is not so much today

  • कल कोई घटना फिर घटेगी, कब ये महामारी हटेगी, मन में है हरा, कोरोना सत्यानाशी कहां से आ मरा आज हमारे बीच

दैनिक भास्कर

May 23, 2020, 05:00 AM IST

विदिशा. एक-दूसरे में उलझती घटनाओं के कथानक में दौड़ते-भागते हम जैसे अब थक गए हैं। बंद कमरों की यंत्रणा झेलते-झेलते अब हम उसके अभ्यस्त से हो चले हैं। सड़कें सूनी हैं और अंधेरा भी गहरा है। हम इस सूनेपन को धकियाते हैं, पर वह घूम फिर कर लौट आता है। हमारे अंदर का सन्नाटा और भी बढ़ने लगता है। हर दिशा में फैलता यह सन्नाटा, जिसने रात और दिन दोनों को ही थाम लिया है। 
अपने वीरान बरामदे में पसरे अंधकार और आसपास सुनाई देती जो सांय-सांय सी, वह शायद इसी सन्नाटे की आवाज है। ऐसा लगता है जैसे आसपास शून्य ओढ़े भीड़भाड़ है, परंतु भीड़ शांत है, चुप है और यही चुप्पी आहट पर आहट करती चली आ रही है। ऐसा लगता है बहुत पास की बल्कि यूं कहें कि ये तमाम लड़ाइयां अपने आसपास की ही हैं। इन्होंने व्यक्ति को अकेला कर दिया है। मौजूदा हालातों में हर गलती अपनी ही की हुई लगती है। मजदूरों का पलायन, उनकी आवाजाही, प्राकृतिक प्रकोप और आर्थिक क्षेत्र में हो रही तबाही क्या एक ही दुर्भाग्य के दो रूप नहीं हैं? हमारे सामने भागता हुआ समय, बेखौफ और बेलगाम होता हुआ कोरोना संक्रमण, मृत्यु का आंकड़ा और इन सबके बीच तबाही मचाता अम्फान तूफान।
उस कविता से क्या होगा जो देश के लोगों के काम ना आ सके:  फिर हम क्या करें? क्या हम इन सब पर कविताएं लिखने लगें। पर उस कविता को लिखकर भी क्या होगा। पहले मुझे लगता था कि कविता हर स्थिति को बदल सकती, मनुष्य को ज्यादा मानवीय बना सकती है। फिर मुझे यह भी लगने लगा था कि कविता एक प्रतिरोध तो कम से कम है ही, नकारात्मकता के खिलाफ। परंतु फिर मुझे लगा उस कविता से क्या होगा जो देश के लोगों को न बचा सके। आंखों के सामने ही सब कुछ नष्ट हो रहा है 
दूसरों को हिदायत देने वाली दादी जब खुद घर छोड़कर चली गईं: परंतु नौकरी पर तो जाना ही पड़ता। हम सब इधर-उधर नौकरियां करते रहे और घर छोड़ कर नहीं जाने की हिदायतें देती दादी खुद ही घर छोड़कर सदा के लिए चली गईं और फिर जाने का सिलसिला चलता ही गया। तब दादी की बात बहुत सामान्य लगती थी, पर आज लगता है दादी ने सीमित संसाधनों में घर-परिवार के साथ ही रहने की बात कही थी। उस समय दादी यह भी बताया करती थी, सब साथ रहते हैं तो कितना ही अंधेरा क्यों न हो कुछ न कुछ उजाला अंदर हमेशा रहता ही है। हमारा प्रिय विदिशा निरापद है, प्रवासी मजदूरों की पीड़ा मिटाता, धूप में जलते पांवों में चप्पल पहनाता, भोजन बांटता, मास्क पहनाता यह विदिशा सेवाभाव को विरासत में लेकर ही तो आज उतना परेशान नहीं है, बाजारों में चहल-पहल लौट रही है, लोग भी सड़कों पर दिख रहे हैं।
उड़ीसा हो या बंगाल हर भारतीय गुजर रहा है इस तूफान से: कोरोना काल में सुपर साइक्लोन की दहशत भी तो कम नहीं है। उड़ीसा हो, पश्चिमी बंगाल हो। ज्वार-भाटा, उछलता समुद्र सब भारत में ही हैं तो सब क्या हममें नहीं हो रहा। हर भारतीय इस तूफान से नहीं गुजर रहा है क्या? दादी की बात मानकर हम तो घर में ही रह रहे हैं। छह फुट की दूरी है, मास्क है, साबुन से हाथ धोकर ही अभी आए हैं। अब हम सभी को कम खाने, गम खाने और घर में ही रहने की आदत डाल ही लेनी चाहिए क्योंकि-कल कोई घटना फिर घटेगी, कब ये महामारी हटेगी, घाव मन में है हरा, कोरोना, सत्यानाशी, कहां से आ मरा।।
किस घर चहचहा रही होगी चिड़ियां
सीढ़ियों पर फिर सन्नाटा आ बैठा, आज के अखबार को पढ़कर। कोरोना के वायरस उड़े उड़कर, गिर रहे कपड़ों, कमीजों पर। हर तरफ उसी के पंजे हैं, भाग कर जाएं कहां, किस घर चिड़ियां चहचहा तो रही हैं, पर फेफड़ों में भर गया है डर।

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