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  • Today Marks 100 Years Of Udayagiri's Rediscovery, But Literary cultural Events Will Be Held In The City After The Transition Is Over

इतिहास:उदयगिरि की पुनः खोज के आज 100 साल पूरे, लेकिन संक्रमण खत्म होने के बाद शहर में होंगे साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजन

विदिशा8 महीने पहले
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  • तत्कालीन ग्वालियर स्टेट के पुरातत्व अधिकारी ने 1921 संवत 1978 में की थी गुफाओं की खोज

चैत्र नवरात्र गुड़ी पड़वा के दिन 13 अप्रैल मंगलवार से ऐतिहासिक उदयगिरि की गुफाओं की पुन: खोज के 100 साल पूरे हो रहे हैं। अभी कोई आयोजन तो नहीं होगा लेकिन कोरोना संक्रमण समाप्त होने के बाद शहर के साहित्यकार और सामाजिक संगठनों से जुड़े अनेक लोग शहर में साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजन करेंगे।

इससे नई पी़ढ़ी के तमाम लोगों को इस ऐतिहासिक धरोहर से अवगत कराया जा सकेगा। गौरतलब है कि तत्कालीन ग्वालियर स्टेट के पुरातत्व विभाग के अधिकारी एमबी गर्दे ने सन् 1921 यानी संवत 1978 में इन गुफाओं की खोज की थी। इस संबंध में एक बोर्ड भी अभी उदयगिरि में लगा हुआ है। इस बोर्ड पर तब के पुरातत्व विभाग के अधिकारी एमबी गर्दे की तरफ से सूचना पट लगाया गया था। महाराजा माधवराव सिंधिया आलिजाह बहादुर,ग्वालियर द्वारा इन गुफाओं के संरक्षण का कार्य किया गया है।

इन गुफाओं को नुकसान पहुंचाने पर सख्त कार्यवाही की जाने की चेतावनी भी अलग से एक सूचना पट पर दी गई है। विदिशा की इस धरोहर को करेंगे स्थापित: इस संबंध में विदिशा के इतिहासकार गोविंद देवलिया बताते हैं कि विक्रम संवत 2078 के प्रारंभ होने पर 13 अप्रैल मंगलवार से उदयगिरि की पुन:खोज के 100 साल पूरे हो रहे हैं। दैनिक भास्कर ने उदयगिरि की पुन: खोज के 100 साल पूरे होने पर सांस्कृतिक आयोजन विषयक मेरी मांग को स्वर दिया है।

कोरोना संक्रमण खत्म होने के बाद भव्य समारोह आयोजित करके विदिशा के वैभव को ,धरोहरों को उनके पुरातात्विक महत्व को रेखांकित करते हुए वैचारिक गोष्ठियों के आयोजन किए जाएंगे। ऐसी मांग भी विदिशा की विरासत के प्रेमी जनों ने प्रशासन एवं राज्य तथा केंद्र शासन से की थी। इसकी प्रारम्भिक सहमति भी बन गई थी।

उदयगिरि अपनी अद्भुत महिषासुर मर्दिनी दुर्गा की प्रतिमा ,विश्व की प्रथम गणेश जी की पाषाण प्रतिमा और वराह प्रतिमा के स्पष्ट अंकन के लिए प्रसिद्ध है। उसी उदयगिरि को चौथी शताब्दी में गुप्त काल में राजा समुद्र गुप्त द्वारा यवनों पर भारत की विजय के प्रतीक रूप में स्थापित किया गया था। चंद्रगुप्त द्वितीय ने वराह प्रतिमा सहित अन्य गुफाओं का निर्माण करवाया था।

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