बड़ी संख्या में पहुंच रहे श्रद्धालु:केवट ने भगवान से कहा- आप भव पार लगाते हैं इसलिए उतराई नहीं लूंगा: डॉ. विश्वेश्वरी

छतरपुर2 महीने पहले
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शहर के चौबे कॉलोनी में संगीतमय श्रीराम कथा चल रही है, जिसे सुनने रोज सैकड़ों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। हरिद्वार से आईं साध्वी डॉ.विश्वेश्वरी देवी रोज राम कथा का वाचन कर रही हैं। आयोजन के छठवें दिन उन्होंने श्रीराम-केवट संवाद की कथा का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि प्रबल प्रेम के पाले पड़कर प्रभु को नियम बदलते देखा के विरद को पूर्ण करने के लिए भगवान केवट के समीप आए।

गंगाजी का किनारा भक्ति का घाट है और केवट भगवान का परम भक्त है, किन्तु वह अपनी भक्ति का प्रदर्शन नहीं करना चाहता अतः वह भगवान से अटपटी चाणी का प्रयोग करता है।केवट ने हठ किया कि आप अपने चरण धुलवाने के लिए मुझे आदेश दे दीजिए तो मैं आपको पार करा दूंगा। केवट ने भगवान से धन-दौलत, पद ऐश्वर्य, कोठी-खजाना नहीं मांगा उसने तो भगवान से उनके चरणों का प्रच्छालन मांगा।

केवट की नाव से गंगाजी को पार करके भगवान ने केवट को उतराई देने का विचार किया। सीताजी ने अर्धांगिनी स्वरूप को सार्थक करते हुए भगवान की मन की बात समझकर अपनी कर मुद्रिका उतारकर उन्हें दे दी। भगवान ने उसे केवट को देने का प्रयास किया किंतु केवट ने उसे न लेते हुए भगवान के चरणों को पकड़ लिया। जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है ऐसे भगवान के श्रीचरणों की सेवा से केवट धन्य हो गया।

भगवान ने उसके निस्वार्थ प्रेम को देखकर उसे दिव्य भक्ति का वरदान दिया तथा उसकी समस्त इच्छाओं को पूर्ण किया। उन्होंने कहा कि चित्रकूट पर भगवान का आगमन हुआ। यहां से भील राज (निषाद) भगवान को प्रणाम करके अपने गृह के लिए वापस हुए। मार्ग में सोकातुर सुमंत को धैर्य देकर उन्होंने अवध में भेजा। सुमंत के द्वारा रामजी का वन गमन सुनकर महाराज दशरथ ने प्राणों का त्याग कर दिया राम विरह में प्राणों का त्याग करके अवधेश संसार में सदा के लिए अमर हो गए।

डॉ. विश्वेश्वरी ने कहा कि श्रीभरत का अयोध्या में आगमन हुआ। कैकयी के द्वारा मांगे वरदान के सत्य से परिचित होकर उन्होंने माता कैकयी का सदा के लिए त्याग कर दिया क्योंकि राम प्रेमियों के लिए राम विरोधी का त्याग आवश्यक है। जो भगवत कर्मों में सहयोगी न बने ऐसे व्यक्ति का त्याग भक्तजनों के द्वारा किया जाता है। कैकेयी का त्याग करके श्रीभरत मां कौशल्या के भवन में आए।

माता कौशल्या ने भरत जी को पूर्ण वात्सल्य प्रदान किया एवं राम वनवास और दशरथ मरण की सम्पूर्ण घटना को सुनाया। भरतजी ने मां के सामने शपथ पूर्वक कहा- मां मैं आपको भगवान श्रीराम से पुनः मिलाउंगा।

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