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हिन्दी दिवस विशेष:हिन्दी प्रचारणी समिति ने 86 वर्षों से संजोकर रखी है हिन्दी की साहित्यिक विरासत, 27 हजार से ज्यादा किताबों का संग्रह

छिंदवाड़ाएक महीने पहले
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छिंदवाड़ा में हिन्दी प्रचारणी समिति पिछले 86 सालों से हिन्दी साहित्य की विरासत को संजोकर हिन्दी का प्रचार प्रसार का केंद्र बनी हुई है। साल 1934 में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और साहित्यकारो ने जबलपुर निवासी शिव नारायण उपाध्याय की प्रेरणा से इस सांस्कृतिक मंच की स्थापना की रुप रेखा बनाकर 1935 में इस समिति की स्थापना की थी। लगभग 86 साल से भी ज्यादा का समय बीत चुका है, हिन्दी प्रचारणी का पौधा वट वृक्ष बनकर आज भी हिन्दी साहित्य का केंद्र बना हुआ है। समिति के सचिव रणधीर सिंह परिहार के मुताबिक इस संस्था में 27 हजार से ज्यादा किताबों का अद्वितीय संग्रह हैं। जिन्हें पढ़ने के लिए रोजना कई पाठक यहां पहुंचते है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र सैंकड़ों छात्र छात्राएं प्रतिदिन यहां अध्ययन कर रहे हैं।

माखन लाल चतुर्वेदी की प्रतिमा की गई स्थापित

अपनी रचनाओं से देशवासियों में स्वतंत्रता की अलख जगाने वाले माखनलाल चतुर्वेदी वर्ष 1922 में छिंदवाड़ा आए थे। वहीं साहित्यकार सेठ गोविंददास का वर्ष 1956 में छिंदवाड़ा आगमन हुआ था। माखनलाल चतुर्वेदी एवं सेठ गोविंददास की प्रतिमाएं हिन्दी प्रचारिणी समिति भवन परिसर में स्थापित की गई हैं।

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आ चुके हैं कई ख्यातनाम साहित्यिकार और कवि

वर्ष 1965 में 29 अगस्त को महादेवी वर्मा का छिंदवाड़ा आगमन हुआ था। इस दौरान वे हिन्दी प्रचारिणी समिति के पुस्तकालय, वाचनालय को देखने पहुंची थीं। यहां पर रजिस्टर में उन्होंने संदेश लिखा था कि- ' छिंदवाड़ा की जनता वस्तुतः बधाई की पात्र है, जो अपनी सीमा में सांस्कृतिक प्रवृत्तियों का विकास करती चलती है।

'डॉ नामवर सिंह ने कहां था हिन्दी का तीर्थ

लगभग एक दशक पहले हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ नामवर सिंह छिंदवाड़ा आए थे इस दौरान जब वे हिंदी प्रचारिणी समिति के प्रांगण में पहुंचे और उन्हें पता चला कि यहां अद्वितीय साहित्य का भंडार है तो उन्होंने प्रवेश से पहले अपने पैर पीछे किए तथा इस धरती को प्रणाम कर कहा कि यह हिन्दी का तीर्थ है।

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