धर्म-कर्म:जहां पुण्य बेचकर पाप खरीदा जाता है, उसे संसार कहते हैं

अंजड़2 महीने पहले
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जो प्राप्त हैं, वहीं पर्याप्त हैं। संसार में सुख का भ्रम हैं। भगवान की वाणी हृदय में उतर जाए तो भव सुधर जाएगा। आरंभ परिग्रह से निवृत होना ही संवेग हैं। यह बात प्रवचन में महासती साधना मसा ने उत्तराध्ययन सूत्र के 29 वें अध्ययन की व्याख्या करते हुए सम्यक पराक्रम को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा संसार के स्वरूप को समझे बिना निर्वेग भाव नही आ सकता। जहां पुण्य बेचकर पाप खरीदा जाता हैं, उसे संसार कहते है। बिना पुण्यवाणी के पुरूषार्थ भी निष्फल हो सकता है। सुबाहुकुमार की कथा सुनाते हुए कहा समय से पहले और भाग्य से ज्यादा कुछ नही मिलता, फिर संसार में इतनी आपाधापी क्यों है। धन इसी भव में साथ रहेगा जबकि धर्म भव-भव तक साथ रहेगा लेकिन हम धन के पीछे भागते हैं और धर्म से विमुख हो जाते हैं।

संसार का अच्छा लगना ही मिथ्यात्व हैं। संसार असार हैं, यहीं निर्वेग भाव हैं। सामयिक मोक्ष का बीज हैं। सामयिक शुद्ध भाव से करना चाहिए। जीनवाणी श्रवण करना भी पिछले कर्मों का पुण्य हैं। जो मान करेगा उसी का अपमान होगा। इसीलिए मानव जीवन में कभी अहं भाव नही रखना चाहिए। आत्मा के स्वरूप को समझना ही आंतरिक दृष्टि हैं। केवल ब्राह्य दृष्टि से देखने के कारण ही संसार में भटकना पड़ता है।

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