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कुम्हारों ने 'चाक' पर दी रफ्तार:नालछा में मिट्टी के दीपक से जगगम करेंगे घर; दीपक के बदले अनाज देने की परंपरा

मांडूएक महीने पहले

कई दशक से दिवाली के पूर्व घरों तक दीपक पहुंचा रहे हैं कुम्हार नगद के बदले आज भी अनाज देकर गांव में दीपक खरीदने की परंपरा नालछा मांडू और आसपास के क्षेत्र में आज भी कायम है। घर घर जाकर किसान तक पहुंचने वाले इन कारणों को बदले में 5 किलो 10 किलो अनाज खुशी से देते हैं और दीपक और दिवाली से जुड़ी मिट्टी की सामग्री खरीदते।

हालांकि बीते कुछ वर्षों में चाइना मेड के साथ अन्य स्टाइलिश दीपक इस दौर में कड़ी टक्कर दे रहे हैं, लेकिन आज भी मिट्टी के दीपक अपनी जगह बचाकर घर आंगन को जगमग करने में आज भी कायम है।

आजकल सेंसर लाइटों का जमाना है, इसके बावजूद मिट्टी के दीयों की चमक कम नहीं है.यह भारतीय परंपरा के अनुरूप है। मिट्टी के दीयें सबसे शुद्ध होते है. इनसे किसी तरह का प्रदूषण भी नहीं फैलाता। नालछा में हस्तकला कुम्हारों के घर को रोशन करने में लगा है। इन परिवारों के जीवन को मिट्टी के बने दीयों से प्रकाशित करने की कोशिश।

दिवाली पर ये कारीगर केवल दीया नहीं बना रहे हैं, बल्कि मूर्ति समेत मिट्टी की कई वस्तुओं को बना रहे हैं। मिट्टी के सामानों को भी कारीगर बनाने में जुटे हैं। चाक के माध्यम से काम कर रहे इन परिवारों के बने सामानों की अच्छी डिमांड होने से इनकी कमाई भी अच्छी हो रही है।

चाक बनाकर किया जा रहा काम

आज भी नालछा नगर व आसपास के क्षेत्र में मिट्टी से दीपक और कई तरह के बर्तन मूर्ति बनाने वाले कारागीर आज भी उसी पद्धति से बना रहे हैं अलग-अलग डिजाइन में और अपनी कला को मूर्त रूप दे रहा है।

कारीगर महेश सिंधिया ने बताया कि मिट्टी के काम से जो कमाई हो रही है, उससे परिवार चल रहा है। मिट्टी के बहुत से सामान बनाए जाते हैं। इससे ग्लास, हड़िया, ढ़कना, सुराही, घड़ा सहित बहुत चीजें बनती है. अभी दीपावली और छठ का समय है।

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