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नवाचार:पानी भर जाने से खेत छोड़ने पड़ते थे खाली, अब धान रोपने से खुशहाली

अटेर11 दिन पहले
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  • अटेर क्षेत्र में दो साल में दोगुना हुआ धान का रकबा, गोहद की तर्ज पर बढ़ रहा आगे, 910 हेक्टेयर पर पहुंचा धान का रकबा

खेती को लाभ का धंधा बनाने के लिए अटेर क्षेत्र के किसानों ने नवाचार किया। परंपरागत खेती छोड़कर अब उन्होंने चावल की खेती शुरू कर दी है, जिसमें वे सफल भी हुए हैं। परिणाम स्वरूप बीते दो साल में क्षेत्र में धान का रकबा बढ़कर दोगुना हो गया है।

बता दें कि जिले में खरीफ सीजन में अधिकांश क्षेत्र के किसान बाजरा, ज्वार, मूंग, उड़द तथा दरहरी जैसी परंपरागत फसलों की पैदावार करते थे। लेकिन कई बार बारिश अधिक होने से खेतों में पानी भर जाता था, जिससे उनकी फसल खराब हो जाती थी । ऐसे में किसानों उन खेतों को खरीफ सीजन में खाली छोड़ना शुरू कर दिया। लेकिन पिछले दो सालों में किसानों ने कृषि वैज्ञानिकों की राय पर उन खेतों में धान की रोपनी शुरू कर दी, जिससे क्षेत्र में चावल की पैदावार शुरु हो गई।

यूं तो जिले में धान की पैदावार गोहद क्षेत्र में अधिक होती थी। लेकिन अब अटेर भी गोहद की तर्ज पर आगे बढ़ रहा है। अब जो खेत दो साल पहले या तो खाली दिखाई देते थे या फिर उनमें बाजरा, तिल, ज्वार आदि फसल दिखती थी, वहां अब धान नजर आ रही है।

2018 में 435 हेक्टेयर था रकबा, अब 910 पर पहुंचा
अटेर क्षेत्र में पिछले तीन साल में धान का रकबा दोगुना हुआ है। कृषि विभाग के अनुसार वर्ष 2018 में अटेर क्षेत्र में धान का रकबा 435 हेक्टेयर, वर्ष 2019 में बढ़कर 664 हेक्टेयर, वर्ष 2020 में 910 हेक्टेयर पर पहुंच गया है।

किसानों को प्रोत्साहित करें तो जिले का दूसरा धान का कटोरा बन सकता है अटेर
किसानों का कहना है कि जिले में अभी धान की सबसे अधिक पैदावार गोहद क्षेत्र में होती है। जिससे वहां के किसानों की माली हालत अटेर क्षेत्र के किसानों से बेहतर है। अगर सरकार की ओर से क्षेत्र के किसानों को धान की पैदावार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए तो जिले में दूसरा धान का कटोरा अटेर क्षेत्र बन सकता है। अटेर के विंडवा, किशुपुरा, सुरपुरा, पिथनपुरा, पाली, बिचौली, जारी, जंजारी, कनेरा, घिनौची, भगरी लाल के पुरा, रैपुरा आदि गांव धान की पैदावार कर रहे हैं। किसानों ने बताया कि इसके अलावा क्षेत्र में धान की रोपाई के लिए लेबर बाहर से बुलवाते हैं। धान की फसल को बेचने के लिए गोहद या फिर इटावा ले जाना पड़ता है, जिसमे खर्च बढ़ जाता है।

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